[1] क़ोरह की औलाद का ज़बूर। मौसीक़ी के राहनुमा के लिए। तर्ज़ : महलत लअन्नोत। हैमान इज़्राही का हिक्मत का गीत। ऐ रब, ऐ मेरी नजात के ख़ुदा, दिन रात मैं तेरे हुज़ूर चीख़ता चिल्लाता हूँ।
[2] मेरी दुआ तेरे हुज़ूर पहुँचे, अपना कान मेरी चीख़ों की तरफ़ झुका।
[3] क्यूँकि मेरी जान दुख से भरी है, और मेरी टाँगें क़ब्र में लटकी हुई हैं।
[4] मुझे उन में शुमार किया जाता है जो पाताल में उतर रहे हैं। मैं उस मर्द की मानिन्द हूँ जिस की तमाम ताक़त जाती रही है।
[5] मुझे मुर्दों में तन्हा छोड़ा गया है, क़ब्र में उन मक़्तूलों की तरह जिन का तू अब ख़याल नहीं रखता और जो तेरे हाथ के सहारे से मुन्क़ते हो गए हैं।
[6] तू ने मुझे सब से गहरे गढ़े में, तारीकतरीन गहराइयों में डाल दिया है।
[7] तेरे ग़ज़ब का पूरा बोझ मुझ पर आ पड़ा है, तू ने मुझे अपनी तमाम मौजों के नीचे दबा दिया है। (सिलाह)
[8] तू ने मेरे क़रीबी दोस्तों को मुझ से दूर कर दिया है, और अब वह मुझ से घिन खाते हैं। मैं फंसा हुआ हूँ और निकल नहीं सकता।
[9] मेरी आँखें ग़म के मारे पझ़मुर्दा हो गई हैं। ऐ रब, दिन भर मैं तुझे पुकारता, अपने हाथ तेरी तरफ़ उठाए रखता हूँ।
[10] क्या तू मुर्दों के लिए मोजिज़े करेगा? क्या पाताल के बाशिन्दे उठ कर तेरी तम्जीद करेंगे? (सिलाह)
[11] क्या लोग क़ब्र में तेरी शफ़्क़त या पाताल में तेरी वफ़ा बयान करेंगे?
[12] क्या तारीकी में तेरे मोजिज़े या मुल्क-ए-फ़रामोश में तेरी रास्ती मालूम हो जाएगी?
[13] लेकिन ऐ रब, मैं मदद के लिए तुझे पुकारता हूँ, मेरी दुआ सुब्ह-सवेरे तेरे सामने आ जाती है।
[14] ऐ रब, तू मेरी जान को क्यूँ रद्द करता, अपने चेहरे को मुझ से पोशीदा क्यूँ रखता है?
[15] मैं मुसीबतज़दा और जवानी से मौत के क़रीब रहा हूँ। तेरे दह्शतनाक हमले बर्दाश्त करते करते मैं जान से हाथ धो बैठा हूँ।
[16] तेरा भड़कता क़हर मुझ पर से गुज़र गया, तेरे हौलनाक कामों ने मुझे नाबूद कर दिया है।
[17] दिन भर वह मुझे सैलाब की तरह घेरे रखते हैं, हर तरफ़ से मुझ पर हम्लाआवर होते हैं।
[18] तू ने मेरे दोस्तों और पड़ोसियों को मुझ से दूर कर रखा है। तारीकी ही मेरी क़रीबी दोस्त बन गई है।