[1] आसफ़ का ज़बूर। मौसीक़ी के राहनुमा के लिए। तर्ज़ : गित्तीत। अल्लाह हमारी क़ुव्वत है। उस की ख़ुशी में शादियाना बजाओ, याक़ूब के ख़ुदा की ताज़ीम में ख़ुशी के नारे लगाओ।
[2] गीत गाना शुरू करो। दफ़ बजाओ, सरोद और सितार की सुरीली आवाज़ निकालो।
[3] नए चाँद के दिन नरसिंगा फूँको, पूरे चाँद के जिस दिन हमारी ईद होती है उसे फूँको।
[4] क्यूँकि यह इस्राईल का फ़र्ज़ है, यह याक़ूब के ख़ुदा का फ़रमान है।
[5] जब यूसुफ़ मिस्र के ख़िलाफ़ निकला तो अल्लाह ने ख़ुद यह मुक़र्रर किया। मैं ने एक ज़बान सुनी, जो मैं अब तक नहीं जानता था,
[6] “मैं ने उस के कंधे पर से बोझ उतारा और उस के हाथ भारी टोकरी उठाने से आज़ाद किए।
[7] मुसीबत में तू ने आवाज़ दी तो मैं ने तुझे बचाया। गरजते बादल में से मैं ने तुझे जवाब दिया और तुझे मरीबा के पानी पर आज़माया। (सिलाह)
[8] ऐ मेरी क़ौम, सुन, तो मैं तुझे आगाह करूँगा। ऐ इस्राईल, काश तू मेरी सुने!
[9] तेरे दरमियान कोई और ख़ुदा न हो, किसी अजनबी माबूद को सिज्दा न कर।
[10] मैं ही रब तेरा ख़ुदा हूँ जो तुझे मुल्क-ए-मिस्र से निकाल लाया। अपना मुँह ख़ूब खोल तो मैं उसे भर दूँगा।
[11] लेकिन मेरी क़ौम ने मेरी न सुनी, इस्राईल मेरी बात मानने के लिए तय्यार न था।
[12] चुनाँचे मैं ने उन्हें उन के दिलों की ज़िद के हवाले कर दिया, और वह अपने ज़ाती मश्वरों के मुताबिक़ ज़िन्दगी गुज़ारने लगे।
[13] काश मेरी क़ौम सुने, इस्राईल मेरी राहों पर चले!
[14] तब मैं जल्दी से उस के दुश्मनों को ज़ेर करता, अपना हाथ उस के मुख़ालिफ़ों के ख़िलाफ़ उठाता।
[15] तब रब से नफ़रत करने वाले दबक कर उस की ख़ुशामद करते, उन की शिकस्त अबदी होती।
[16] लेकिन इस्राईल को मैं बेहतरीन गन्दुम खिलाता, मैं चटान में से शहद निकाल कर उसे सेर करता।”