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[1] क़ोरह की औलाद का ज़बूर। मौसीक़ी के राहनुमा के लिए। गीत का तर्ज़ : कुंवारियाँ। अल्लाह हमारी पनाहगाह और क़ुव्वत है। मुसीबत के वक़्त वह हमारा मज़बूत सहारा साबित हुआ है।

[2] इस लिए हम ख़ौफ़ नहीं खाएँगे, गो ज़मीन लरज़ उठे और पहाड़ झूम कर समुन्दर की गहराइयों में गिर जाएँ,

[3] गो समुन्दर शोर मचा कर ठाठें मारे और पहाड़ उस की दहाड़ों से काँप उठें। (सिलाह)

[4] दरया की शाख़ें अल्लाह के शहर को ख़ुश करती हैं, उस शहर को जो अल्लाह तआला की मुक़द्दस सुकूनतगाह है।

[5] अल्लाह उस के बीच में है, इस लिए शहर नहीं डगमगाएगा। सुब्ह-सवेरे ही अल्लाह उस की मदद करेगा।

[6] क़ौमें शोर मचाने, सल्तनतें लड़खड़ाने लगीं। अल्लाह ने आवाज़ दी तो ज़मीन लरज़ उठी।

[7] रब्ब-उल-अफ़्वाज हमारे साथ है, याक़ूब का ख़ुदा हमारा क़िला है। (सिलाह)

[8] आओ, रब के अज़ीम कामों पर नज़र डालो! उसी ने ज़मीन पर हौलनाक तबाही नाज़िल की है।

[9] वही दुनिया की इन्तिहा तक जंगें रोक देता, वही कमान को तोड़ देता, नेज़े को टुकड़े टुकड़े करता और ढाल को जला देता है।

[10] वह फ़रमाता है, “अपनी हरकतों से बाज़ आओ! जान लो कि मैं ख़ुदा हूँ। मैं अक़्वाम में सरबुलन्द और दुनिया में सरफ़राज़ हूँगा।”

[11] रब्ब-उल-अफ़्वाज हमारे साथ है। याक़ूब का ख़ुदा हमारा क़िला है। (सिलाह)

ज़बूर — Chapters