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[1] दाऊद का ज़बूर। ऐ रब, मैं तुझे पुकारता हूँ। ऐ मेरी चटान, ख़ामोशी से अपना मुँह मुझ से न फेर। क्यूँकि अगर तू चुप रहे तो मैं मौत के गढ़े में उतरने वालों की मानिन्द हो जाऊँगा।

[2] मेरी इल्तिजाएँ सुन जब मैं चीख़ते चिल्लाते तुझ से मदद माँगता हूँ, जब मैं अपने हाथ तेरी सुकूनतगाह के मुक़द्दसतरीन कमरे की तरफ़ उठाता हूँ।

[3] मुझे उन बेदीनों के साथ घसीट कर सज़ा न दे जो ग़लत काम करते हैं, जो अपने पड़ोसियों से बज़ाहिर दोस्ताना बातें करते, लेकिन दिल में उन के ख़िलाफ़ बुरे मन्सूबे बांधते हैं।

[4] उन्हें उन की हरकतों और बुरे कामों का बदला दे। जो कुछ उन के हाथों से सरज़द हुआ है उस की पूरी सज़ा दे। उन्हें उतना ही नुक़्सान पहुँचा दे जितना उन्हों ने दूसरों को पहुँचाया है।

[5] क्यूँकि न वह रब के आमाल पर, न उस के हाथों के काम पर तवज्जुह देते हैं। अल्लाह उन्हें ढा देगा और दुबारा कभी तामीर नहीं करेगा।

[6] रब की तम्जीद हो, क्यूँकि उस ने मेरी इल्तिजा सुन ली।

[7] रब मेरी क़ुव्वत और मेरी ढाल है। उस पर मेरे दिल ने भरोसा रखा, उस से मुझे मदद मिली है। मेरा दिल शादियाना बजाता है, मैं गीत गा कर उस की सताइश करता हूँ।

[8] रब अपनी क़ौम की क़ुव्वत और अपने मसह किए हुए ख़ादिम का नजातबख़्श क़िला है।

[9] ऐ रब, अपनी क़ौम को नजात दे! अपनी मीरास को बरकत दे! उन की गल्लाबानी करके उन्हें हमेशा तक उठाए रख।

ज़बूर — Chapters