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[1] ज़ियारत का गीत। मैं अपनी आँखों को तेरी तरफ़ उठाता हूँ, तेरी तरफ़ जो आसमान पर तख़्तनशीन है।

[2] जिस तरह ग़ुलाम की आँखें अपने मालिक के हाथ की तरफ़ और लौंडी की आँखें अपनी मालिकन के हाथ की तरफ़ लगी रहती हैं उसी तरह हमारी आँखें रब अपने ख़ुदा पर लगी रहती हैं, जब तक वह हम पर मेहरबानी न करे।

[3] ऐ रब, हम पर मेहरबानी कर, हम पर मेहरबानी कर! क्यूँकि हम हद से ज़्यादा हिक़ारत का निशाना बन गए हैं।

[4] सुकून से ज़िन्दगी गुज़ारने वालों की लान-तान और मग़रूरों की तह्क़ीर से हमारी जान दूभर हो गई है।

ज़बूर — Chapters