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[1] दाऊद का ज़बूर। मौसीक़ी के राहनुमा के लिए। अहमक़ दिल में कहता है, “अल्लाह है ही नहीं!” ऐसे लोग बदचलन हैं, उन की हरकतें क़ाबिल-ए-घिन हैं। एक भी नहीं है जो अच्छा काम करे।

[2] रब ने आसमान से इन्सान पर नज़र डाली ताकि देखे कि क्या कोई समझदार है? क्या कोई अल्लाह का तालिब है?

[3] अफ़्सोस, सब सहीह राह से भटक गए, सब के सब बिगड़ गए हैं। कोई नहीं जो भलाई करता हो, एक भी नहीं।

[4] क्या जो बदी करके मेरी क़ौम को रोटी की तरह खा लेते हैं उन में से एक को भी समझ नहीं आती? वह तो रब को पुकारते ही नहीं।

[5] तब उन पर सख़्त दह्शत छा गई, क्यूँकि अल्लाह रास्तबाज़ की नस्ल के साथ है।

[6] तुम नाचार के मन्सूबों को ख़ाक में मिलाना चाहते हो, लेकिन रब ख़ुद उस की पनाहगाह है।

[7] काश कोह-ए-सिय्यून से इस्राईल की नजात निकले! जब रब अपनी क़ौम को बहाल करेगा तो याक़ूब ख़ुशी के नारे लगाएगा, इस्राईल बाग़ बाग़ होगा।

ज़बूर — Chapters