[1] मुसीबतज़दा की दुआ, उस वक़्त जब वह निढाल हो कर रब के सामने अपनी आह-ओ-ज़ारी उंडेल देता है। ऐ रब, मेरी दुआ सुन! मदद के लिए मेरी आहें तेरे हुज़ूर पहुँचें।
[2] जब मैं मुसीबत में हूँ तो अपना चेहरा मुझ से छुपाए न रख बल्कि अपना कान मेरी तरफ़ झुका। जब मैं पुकारूँ तो जल्द ही मेरी सुन।
[3] क्यूँकि मेरे दिन धुएँ की तरह ग़ाइब हो रहे हैं, मेरी हड्डियाँ कोएलों की तरह दहक रही हैं।
[4] मेरा दिल घास की तरह झुलस कर सूख गया है, और मैं रोटी खाना भी भूल गया हूँ।
[5] आह-ओ-ज़ारी करते करते मेरा जिस्म सुकड़ गया है, जिल्द और हड्डियाँ ही रह गई हैं।
[6] मैं रेगिस्तान में दश्ती उल्लू और खंडरात में छोटे उल्लू की मानिन्द हूँ।
[7] मैं बिस्तर पर जागता रहता हूँ, छत पर तन्हा परिन्दे की मानिन्द हूँ।
[8] दिन भर मेरे दुश्मन मुझे लान-तान करते हैं। जो मेरा मज़ाक़ उड़ाते हैं वह मेरा नाम ले कर लानत करते हैं।
[9] राख मेरी रोटी है, और जो कुछ पीता हूँ उस में मेरे आँसू मिले होते हैं।
[10] क्यूँकि मुझ पर तेरी लानत और तेरा ग़ज़ब नाज़िल हुआ है। तू ने मुझे उठा कर ज़मीन पर पटख़ दिया है।
[11] मेरे दिन शाम के ढलने वाले साय की मानिन्द हैं। मैं घास की तरह सूख रहा हूँ।
[12] लेकिन तू ऐ रब अबद तक तख़्तनशीन है, तेरा नाम पुश्त-दर-पुश्त क़ाइम रहता है।
[13] अब आ, कोह-ए-सिय्यून पर रहम कर। क्यूँकि उस पर मेहरबानी करने का वक़्त आ गया है, मुक़र्ररा वक़्त आ गया है।
[14] क्यूँकि तेरे ख़ादिमों को उस का एक एक पत्थर प्यारा है, और वह उस के मल्बे पर तरस खाते हैं।
[15] तब ही क़ौमें रब के नाम से डरेंगी, और दुनिया के तमाम बादशाह तेरे जलाल का ख़ौफ़ खाएँगे।
[16] क्यूँकि रब सिय्यून को अज़ सर-ए-नौ तामीर करेगा, वह अपने पूरे जलाल के साथ ज़ाहिर हो जाएगा।
[17] मुफ़लिसों की दुआ पर वह ध्यान देगा और उन की फ़र्यादों को हक़ीर नहीं जानेगा।
[18] आने वाली नस्ल के लिए यह क़लमबन्द हो जाए ताकि जो क़ौम अभी पैदा नहीं हुई वह रब की सताइश करे।
[19] क्यूँकि रब ने अपने मक़्दिस की बुलन्दियों से झाँका है, उस ने आसमान से ज़मीन पर नज़र डाली है
[20] ताकि क़ैदियों की आह-ओ-ज़ारी सुने और मरने वालों की ज़न्जीरें खोले।
[21] क्यूँकि उस की मर्ज़ी है कि वह कोह-ए-सिय्यून पर रब के नाम का एलान करें और यरूशलम में उस की सताइश करें,
[22] कि क़ौमें और सल्तनतें मिल कर जमा हो जाएँ और रब की इबादत करें।
[23] रास्ते में ही अल्लाह ने मेरी ताक़त तोड़ कर मेरे दिन मुख़्तसर कर दिए हैं।
[24] मैं बोला, “ऐ मेरे ख़ुदा, मुझे ज़िन्दों के मुल्क से दूर न कर, मेरी ज़िन्दगी तो अधूरी रह गई है। लेकिन तेरे साल पुश्त-दर-पुश्त क़ाइम रहते हैं।
[25] तू ने क़दीम ज़माने में ज़मीन की बुन्याद रखी, और तेरे ही हाथों ने आसमानों को बनाया।
[26] यह तो तबाह हो जाएंगे, लेकिन तू क़ाइम रहेगा। यह सब कपड़े की तरह घिस फट जाएंगे। तू उन्हें पुराने लिबास की तरह बदल देगा, और वह जाते रहेंगे।
[27] लेकिन तू वही का वही रहता है, और तेरी ज़िन्दगी कभी ख़त्म नहीं होती।
[28] तेरे ख़ादिमों के फ़र्ज़न्द तेरे हुज़ूर बसते रहेंगे, और उन की औलाद तेरे सामने क़ाइम रहेगी।”