[1] आसफ़ का ज़बूर। हिक्मत का गीत। ऐ अल्लाह, तू ने हमें हमेशा के लिए क्यूँ रद्द किया है? अपनी चरागाह की भेड़ों पर तेरा क़हर क्यूँ भड़कता रहता है?
[2] अपनी जमाअत को याद कर जिसे तू ने क़दीम ज़माने में ख़रीदा और इवज़ाना दे कर छुड़ाया ताकि तेरी मीरास का क़बीला हो। कोह-ए-सिय्यून को याद कर जिस पर तू सुकूनतपज़ीर रहा है।
[3] अपने क़दम इन दाइमी खंडरात की तरफ़ बढ़ा। दुश्मन ने मक़्दिस में सब कुछ तबाह कर दिया है।
[4] तेरे मुख़ालिफ़ों ने गरजते हुए तेरी जल्सागाह में अपने निशान गाड़ दिए हैं।
[5] उन्हों ने गुंजान जंगल में लक्कड़हारों की तरह अपने कुल्हाड़े चलाए,
[6] अपने कुल्हाड़ों और कुदालों से उस की तमाम कन्दाकारी को टुकड़े टुकड़े कर दिया है।
[7] उन्हों ने तेरे मक़्दिस को भस्म कर दिया, फ़र्श तक तेरे नाम की सुकूनतगाह की बेहुरमती की है।
[8] अपने दिल में वह बोले, “आओ, हम उन सब को ख़ाक में मिलाएँ!” उन्हों ने मुल्क में अल्लाह की हर इबादतगाह नज़र-ए-आतिश कर दी है।
[9] अब हम पर कोई इलाही निशान ज़ाहिर नहीं होता। न कोई नबी हमारे पास रह गया, न कोई और मौजूद है जो जानता हो कि ऐसे हालात कब तक रहेंगे।
[10] ऐ अल्लाह, हरीफ़ कब तक लान-तान करेगा, दुश्मन कब तक तेरे नाम की तक्फ़ीर करेगा?
[11] तू अपना हाथ क्यूँ हटाता, अपना दहना हाथ दूर क्यूँ रखता है? उसे अपनी चादर से निकाल कर उन्हें तबाह कर दे!
[12] अल्लाह क़दीम ज़माने से मेरा बादशाह है, वही दुनिया में नजातबख़्श काम अन्जाम देता है।
[13] तू ही ने अपनी क़ुदरत से समुन्दर को चीर कर पानी में अज़दहाओं के सरों को तोड़ डाला।
[14] तू ही ने लिवियातान के सरों को चूर चूर करके उसे जंगली जानवरों को खिला दिया।
[15] एक जगह तू ने चश्मे और नदियाँ फूटने दीं, दूसरी जगह कभी न सूखने वाले दरया सूखने दिए।
[16] दिन भी तेरा है, रात भी तेरी ही है। चाँद और सूरज तेरे ही हाथ से क़ाइम हुए।
[17] तू ही ने ज़मीन की हुदूद मुक़र्रर कीं, तू ही ने गर्मियों और सर्दियों के मौसम बनाए।
[18] ऐ रब, दुश्मन की लान-तान याद कर। ख़याल कर कि अहमक़ क़ौम तेरे नाम पर कुफ़्र बकती है।
[19] अपने कबूतर की जान को वहशी जानवरों के हवाले न कर, हमेशा तक अपने मुसीबतज़दों की ज़िन्दगी को न भूल।
[20] अपने अह्द का लिहाज़ कर, क्यूँकि मुल्क के तारीक कोने ज़ुल्म के मैदानों से भर गए हैं।
[21] होने न दे कि मज़्लूमों को शर्मिन्दा हो कर पीछे हटना पड़े बल्कि बख़्श दे कि मुसीबतज़दा और ग़रीब तेरे नाम पर फ़ख़र कर सकें।
[22] ऐ अल्लाह, उठ कर अदालत में अपने मुआमले का दिफ़ा कर। याद रहे कि अहमक़ दिन भर तुझे लान-तान करता है।
[23] अपने दुश्मनों के नारे न भूल बल्कि अपने मुख़ालिफ़ों का मुसलसल बढ़ता हुआ शोर-शराबा याद कर।