Skip to content
Opens in a new window
Listen to this chapter • 1:17

[1] दाऊद का ज़बूर। मौसीक़ी के राहनुमा के लिए। हिक्मत का गीत। तर्ज़ : महलत। अहमक़ दिल में कहता है, “अल्लाह है ही नहीं!” ऐसे लोग बदचलन हैं, उन की हरकतें क़ाबिल-ए-घिन हैं। एक भी नहीं है जो अच्छा काम करे।

[2] अल्लाह ने आसमान से इन्सान पर नज़र डाली ताकि देखे कि क्या कोई समझदार है? क्या कोई अल्लाह का तालिब है?

[3] अफ़्सोस, सब सहीह राह से भटक गए, सब के सब बिगड़ गए हैं। कोई नहीं जो भलाई करता हो, एक भी नहीं।

[4] क्या जो बदी करके मेरी क़ौम को रोटी की तरह खा लेते हैं उन्हें समझ नहीं आती? वह तो अल्लाह को पुकारते ही नहीं।

[5] तब उन पर सख़्त दह्शत वहाँ छा गई जहाँ पहले दह्शत का सबब नहीं था। जिन्हों ने तुझे घेर रखा था अल्लाह ने उन की हड्डियाँ बिखेर दीं। तू ने उन को रुसवा किया, क्यूँकि अल्लाह ने उन्हें रद्द किया है।

[6] काश कोह-ए-सिय्यून से इस्राईल की नजात निकले! जब रब अपनी क़ौम को बहाल करेगा तो याक़ूब ख़ुशी के नारे लगाएगा, इस्राईल बाग़ बाग़ होगा।

ज़बूर — Chapters