Skip to content
Opens in a new window
Listen to this chapter • 1:02

[1] आसफ़ का ज़बूर। अल्लाह इलाही मजलिस में खड़ा है, माबूदों के दरमियान वह अदालत करता है,

[2] “तुम कब तक अदालत में ग़लत फ़ैसले करके बेदीनों की जानिबदारी करोगे? (सिलाह)

[3] पस्तहालों और यतीमों का इन्साफ़ करो, मुसीबतज़दों और ज़रूरतमन्दों के हुक़ूक़ क़ाइम रखो।

[4] पस्तहालों और ग़रीबों को बचा कर बेदीनों के हाथ से छुड़ाओ।”

[5] लेकिन वह कुछ नहीं जानते, उन्हें समझ ही नहीं आती। वह तारीकी में टटोल टटोल कर घूमते फिरते हैं जबकि ज़मीन की तमाम बुन्यादें झूमने लगी हैं।

[6] बेशक मैं ने कहा, “तुम ख़ुदा हो, सब अल्लाह तआला के फ़र्ज़न्द हो।

[7] लेकिन तुम फ़ानी इन्सान की तरह मर जाओगे, तुम दीगर हुक्मरानों की तरह गिर जाओगे।”

[8] ऐ अल्लाह, उठ कर ज़मीन की अदालत कर! क्यूँकि तमाम अक़्वाम तेरी ही मौरूसी मिलकियत हैं।

ज़बूर — Chapters