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[1] दाऊद का ज़बूर। मौसीक़ी के राहनुमा के लिए। ऐ रब, मुझे शरीरों से छुड़ा और ज़ालिमों से मह्फ़ूज़ रख।

[2] दिल में वह बुरे मन्सूबे बांधते, रोज़ाना जंग छेड़ते हैं।

[3] उन की ज़बान साँप की ज़बान जैसी तेज़ है, और उन के होंटों में साँप का ज़हर है। (सिलाह)

[4] ऐ रब, मुझे बेदीन के हाथों से मह्फ़ूज़ रख, ज़ालिम से मुझे बचाए रख, उन से जो मेरे पाँओ को ठोकर खिलाने के मन्सूबे बांध रहे हैं।

[5] मग़रूरों ने मेरे रास्ते में फंदा और रस्से छुपाए हैं, उन्हों ने जाल बिछा कर रास्ते के किनारे किनारे मुझे पकड़ने के फंदे लगाए हैं। (सिलाह)

[6] मैं रब से कहता हूँ, “तू ही मेरा ख़ुदा है, मेरी इल्तिजाओं की आवाज़ सुन!”

[7] ऐ रब क़ादिर-ए-मुतलक़, ऐ मेरी क़वी नजात! जंग के दिन तू अपनी ढाल से मेरे सर की हिफ़ाज़त करता है।

[8] ऐ रब, बेदीन का लालच पूरा न कर। उस का इरादा कामयाब होने न दे, ऐसा न हो कि यह लोग सरफ़राज़ हो जाएँ। (सिलाह)

[9] उन्हों ने मुझे घेर लिया है, लेकिन जो आफ़त उन के होंट मुझ पर लाना चाहते हैं वह उन के अपने सरों पर आए!

[10] दहकते कोएले उन पर बरसें, और उन्हें आग में, अथाह गढ़ों में फैंका जाए ताकि आइन्दा कभी न उठें।

[11] तोहमत लगाने वाला मुल्क में क़ाइम न रहे, और बुराई ज़ालिम को मार मार कर उस का पीछा करे।

[12] मैं जानता हूँ कि रब अदालत में मुसीबतज़दा का दिफ़ा करेगा। वही ज़रूरतमन्द का इन्साफ़ करेगा।

[13] यक़ीनन रास्तबाज़ तेरे नाम की सताइश करेंगे, और दियानतदार तेरे हुज़ूर बसेंगे।

ज़बूर — Chapters