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[1] आसफ़ का ज़बूर। यक़ीनन अल्लाह इस्राईल पर मेहरबान है, उन पर जिन के दिल पाक हैं।

[2] लेकिन मैं फिसलने को था, मेरे क़दम लग़्ज़िश खाने को थे।

[3] क्यूँकि शेख़ीबाज़ों को देख कर मैं बेचैन हो गया, इस लिए कि बेदीन इतने ख़ुशहाल हैं।

[4] मरते वक़्त उन को कोई तक्लीफ़ नहीं होती, और उन के जिस्म मोटे-ताज़े रहते हैं।

[5] आम लोगों के मसाइल से उन का वास्ता नहीं पड़ता। जिस दर्द-ओ-करब में दूसरे मुब्तला रहते हैं उस से वह आज़ाद होते हैं।

[6] इस लिए उन के गले में तकब्बुर का हार है, वह ज़ुल्म का लिबास पहने फिरते हैं।

[7] चर्बी के बाइस उन की आँखें उभर आई हैं। उन के दिल बेलगाम वहमों की गिरिफ़्त में रहते हैं।

[8] वह मज़ाक़ उड़ा कर बुरी बातें करते हैं, अपने ग़ुरूर में ज़ुल्म की धमकियाँ देते हैं।

[9] वह समझते हैं कि जो कुछ हमारे मुँह से निकलता है वह आसमान से है, जो बात हमारी ज़बान पर आ जाती है वह पूरी ज़मीन के लिए अहमियत रखती है।

[10] चुनाँचे अवाम उन की तरफ़ रुजू होते हैं, क्यूँकि उन के हाँ कस्रत का पानी पिया जाता है।

[11] वह कहते हैं, “अल्लाह को क्या पता है? अल्लाह तआला को इल्म ही नहीं।”

[12] देखो, यही है बेदीनों का हाल। वह हमेशा सुकून से रहते, हमेशा अपनी दौलत में इज़ाफ़ा करते हैं।

[13] यक़ीनन मैं ने बेफ़ाइदा अपना दिल पाक रखा और अबस अपने हाथ ग़लत काम करने से बाज़ रखे।

[14] क्यूँकि दिन भर मैं दर्द-ओ-करब में मुब्तला रहता हूँ, हर सुब्ह मुझे सज़ा दी जाती है।

[15] अगर मैं कहता, “मैं भी उन की तरह बोलूँगा,” तो तेरे फ़र्ज़न्दों की नस्ल से ग़द्दारी करता।

[16] मैं सोच-बिचार में पड़ गया ताकि बात समझूँ, लेकिन सोचते सोचते थक गया, अज़ियत में सिर्फ़ इज़ाफ़ा हुआ।

[17] तब मैं अल्लाह के मक़्दिस में दाख़िल हो कर समझ गया कि उन का अन्जाम क्या होगा।

[18] यक़ीनन तू उन्हें फिसलनी जगह पर रखेगा, उन्हें फ़रेब में फंसा कर ज़मीन पर पटख़ देगा।

[19] अचानक ही वह तबाह हो जाएंगे, दह्शतनाक मुसीबत में फंस कर मुकम्मल तौर पर फ़ना हो जाएंगे।

[20] ऐ रब, जिस तरह ख़्वाब जाग उठते वक़्त ग़ैरहक़ीक़ी साबित होता है उसी तरह तू उठते वक़्त उन्हें वहम क़रार दे कर हक़ीर जानेगा।

[21] जब मेरे दिल में तल्ख़ी पैदा हुई और मेरे बातिन में सख़्त दर्द था

[22] तो मैं अहमक़ था। मैं कुछ नहीं समझता था बल्कि तेरे सामने मवेशी की मानिन्द था।

[23] तो भी मैं हमेशा तेरे साथ लिपटा रहूँगा, क्यूँकि तू मेरा दहना हाथ थामे रखता है।

[24] तू अपने मश्वरे से मेरी क़ियादत करके आख़िर में इज़्ज़त के साथ मेरा ख़ैरमक़्दम करेगा।

[25] जब तू मेरे साथ है तो मुझे आसमान पर क्या कमी होगी? जब तू मेरे साथ है तो मैं ज़मीन की कोई भी चीज़ नहीं चाहूँगा।

[26] ख़्वाह मेरा जिस्म और मेरा दिल जवाब दे जाएँ, लेकिन अल्लाह हमेशा तक मेरे दिल की चटान और मेरी मीरास है।

[27] यक़ीनन जो तुझ से दूर हैं वह हलाक हो जाएंगे, जो तुझ से बेवफ़ा हैं उन्हें तू तबाह कर देगा।

[28] लेकिन मेरे लिए अल्लाह की क़ुर्बत सब कुछ है। मैं ने रब क़ादिर-ए-मुतलक़ को अपनी पनाहगाह बनाया है, और मैं लोगों को तेरे तमाम काम सुनाऊँगा।

ज़बूर — Chapters