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[1] तब सूही के रहइया बिलदद ह जबाब दीस:

[2] “तेंह कब तक अइसने बातमन ला कहत रहिबे? तोर गोठमन गरजत गरेर सहीं अंय?

[3] का परमेसर ह नियाय ला बिगाड़थे? का सर्वसक्तिमान ह सही बात ला गलत कर देथे?

[4] जब तोर लइकामन परमेसर के बिरूध पाप करिन, त ओह ओमन ला ओमन के पाप के सजा दीस।

[5] पर यदि तेंह ईमानदारी ले परमेसर ला सहायता बर खोजबे, अऊ सर्वसक्तिमान ले बिनती करबे,

[6] कहूं तेंह सुध अऊ धरमी अस, त अभी घलो ओह तोर कोति ले ठाढ़ होही अऊ तोला तोर पहिले के सम्पन्न दसा म ला दीही।

[7] तोर सुरूआत ह छोटे जान पड़ही, पर तोर भविस्य म बहुंत बढ़ती होही।

[8] “पिछला पीढ़ी के मनखेमन ले पुछ अऊ पता लगा कि ओमन के पुरखामन का सीखे रिहिन,

[9] काबरकि हमन तो कल जनमे हन अऊ कुछू नइं जानन, अऊ धरती म हमर दिन ह छइहां कस अय।

[10] जऊन मन हमर ले पहिले आईन, का ओमन तोला नइं सिखाहीं अऊ नइं बताहीं? का ओमन अपन समझ ले बात नइं करहीं?

[11] जिहां दलदली भुइयां नइं ए, का उहां पपीरस पऊधा ह लम्बा बढ़ सकथे? का पानी बिगर कछार के कांदी ह बढ़ सकथे?

[12] ओमन बढ़ सकथें अऊ काटे घलो नइं गे रहंय, पर ओमन कांदी ले घलो जल्दी सूख जाथें।

[13] जऊन मन परमेसर ला बिसरा देथें, ओ जम्मो के हाल अइसने होथे; अऊ अइसने भक्तिहीन मनखेमन के आसा ह टूट जाथे।

[14] जेकर ऊपर ओमन भरोसा करथें, ओह कमजोर होथे; अऊ जेला ओमन पतियाथें, ओह मेकरा के जाला सहीं अय।

[15] ओमन जाला के ऊपर आसरा करथें, पर ओह टूट जाथे; ओमन ओला थामथें, पर ओह थामे नइं रहय।

[16] ओमन घाम म पानी पलोय गे पऊधा सहीं अंय, जेकर डारामन बारी म चारों कोति बगरथें;

[17] येह अपन जरीमन ला पथरा के कुढ़ा के चारों कोति लपेटथे अऊ पथरामन के बीच म जगह खोजथे।

[18] कहूं येला अपन जगह ले उखान दिये जाथे, त ओ जगह ह ओकर इनकार करथे अऊ कहिथे, ‘मेंह तोला कभू देखे घलो नइं अंव।’

[19] खचित, इही ह येकर जिनगी के अन्त अय, अऊ ओ माटी म ले आने पऊधामन जामथें।

[20] “खचित, परमेसर ह निरदोस मनखे ला अस्वीकार नइं करय या दुस्ट काम करइया मनखेमन के हांथ ला मजबूत नइं करय।

[21] ओह अब भी तोर मुहूं ला हंसी ले अऊ तोर ओंठमन ला आनंद के जयकार ले भर दीही।

[22] तोर बईरीमन ला लज्जित करे जाही, अऊ दुस्टमन के डेरा कहूं मेर नइं रहिही।”

अयूब — Chapters