[1] तब अयूब ह जबाब दीस:
[2] “तेंह कइसे निरबलमन के मदद करे हवस! तेंह कइसे ओ मनखे ला संभाले हस, जऊन ह कमजोर हवय!
[3] तेंह ओ मनखे ला का सलाह दे हवस, जेकर करा बुद्धि नइं ए! अऊ तेंह का अंतर-गियान देखाय हवस!
[4] कोन ह तोला ये गोठ कहे बर मदद करे हवय? अऊ काकर आतमा ह तोर मुहूं ले गोठियाईस?
[5] “मरे मनखेमन बहुंत पीरा म हवंय, ओमन, जऊन मन पानी के खाल्हे अऊ ओ जम्मो, जऊन मन ओमा रहिथंय।
[6] अधोलोक ह परमेसर के आघू म खुला हवय; बिनास ह नइं तोपाय हवय।
[7] ओह उत्तर दिग के अकासमन ला खाली जगह म बगराथे; ओह धरती ला अधर म लटकाय हवय।
[8] ओह बारिस के पानी ला अपन बादर म लपेटे हवय, तभो ले बादरमन ओमन के बोझ म होके बरसंय नइं।
[9] ओह पून्नी के चंदा ला ढांप देथे, ओकर ऊपर अपन बादरमन ला बगराय के दुवारा।
[10] अंजोर अऊ अंधियार के बीच म सिवाना बांधे बर ओह समुंदर के सतह म छितिज ला ठहिराय हवय।
[11] ओकर दबकारे ले अकास के खंभामन डरके थर-थर कांपथें।
[12] अपन सामर्थ ले ओह समुंदर ला सांत कर देथे; अपन बुद्धि ले ओह राहाब ला कुटा-कुटा कर देथे।
[13] ओकर सांस ले अकास-मंडल साफ हो जाथे; ओकर हांथ ह भागत सांप ला मार देथे।
[14] अऊ येमन तो ओकर काम के सिरिप एक झलक अंय; ओकर फुसफुसाहट हमन ला कतेक कम सुनई देथे! त फेर ओकर सामर्थ के गरजन ला कोन ह समझ सकथे?”