[1] तब नामात के रहइया सोपर ह जबाब दीस:
[2] “का ये जम्मो गोठ के जबाब नइं देना चाही? का ये गोठ कहइया के समरथन करे जावय?
[3] का तोर बड़े बोल ले आने मन चुप रहंय? का तोला कोनो झन डांटय, जब तेंह हंसी उड़ाथस?
[4] तेंह परमेसर ले कहिथस, ‘मोर बिसवास म कोनो कमी नइं ए अऊ मेंह तोर नजर म सुध हवंव।’
[5] बने होतिस, परमेसर ह खुद गोठियातिस, अऊ तोर बिरोध म अपन मुहूं ला खोलतिस
[6] अऊ तोर ऊपर बुद्धि के गुपत गोठमन ला परगट करतिस, काबरकि सत-बुद्धि के दू ठन पहलू हवय। येला जान ले: परमेसर ह तोर कुछू पापमन ला भुला गे हवय।
[7] “का तेंह परमेसर के भेद के बातमन ला समझ सकथस? का तेंह सर्वसक्तिमान के सीमना के पता पा सकत हस?
[8] ओमन स्वरगमन ले घलो ऊंच हवंय—तेंह का कर सकत हस? ओह तो पाताल-लोक ले जादा गहिरा हवय—तेंह का जान सकत हस?
[9] ओमन के नाप ह धरती ले लम्बा अऊ समुंदर ले घलो जादा चाकर हवय।
[10] “कहूं ओह आवय अऊ तोला जेल म डाल देवय अऊ अदालत लगावय, त कोन ह ओला रोक सकथे?
[11] खचित ओह धोखा देवइयामन ला चिन लेथे; अऊ जब ओह बुरई देखथे, त का ओह ओला धियान नइं देवय?
[12] पर मुरूख मनखे ह बुद्धिमान नइं बन सकय, जइसे कि जंगली गदहा के पीला ह मनखे के रूप म नइं जनम सकय।
[13] “तभो ले कहूं तेंह अपन मन ला ओकर कोति लगाथस अऊ अपन हांथमन ला ओकर कोति पसारथस,
[14] यदि तेंह अपन पापमन ला छोंड़ देथस अऊ अपन डेरा म बुरई ला रहे बर नइं देवस,
[15] तब, तेंह निरदोस होके अपन चेहरा ऊपर उठा सकबे; अऊ तेंह बिगर भय के मजबूत ठाढ़े रहिबे।
[16] तेंह खचित अपन दुख ला भुला जाबे, ओह तोला सिरिप बहा दिये गय पानी कस सुरता रहिही।
[17] तोर जिनगी ह मंझनियां ले घलो जादा चमकदार होही, अऊ अंधियार ह बिहनियां कस हो जाही।
[18] तेंह सुरकछित रहिबे, काबरकि तोला आसा होही; तेंह अपनआप ला देखबे अऊ निरभय होके अराम करबे।
[19] जब तेंह लेटबे, त तोला कोनो नइं डराहीं, अऊ बहुंते झन तोर बर मया देखाहीं।
[20] पर दुस्ट मनखेमन के आंखीमन अंधरा हो जाहीं, अऊ ओमन ला बचके निकले के कोनो रसता नइं दिखही; ओमन ये आसा करहीं कि ओमन मर जावंय।”