Skip to content
Opens in a new window
Listen to this chapter • 3:26

[1] तब नामात के रहइया सोपर ह जबाब दीस:

[2] “मोर बियाकुल बिचार ह मोला उकसावत हे कि मेंह जबाब दंव काबरकि मेंह बहुंत असांत हंव।

[3] मेंह एक डांट सुनेंव, जेकर ले मोर अपमान होथे, अऊ मोर समझ ह जबाब देय बर मोला उकसावत हे।

[4] “खचित तेंह जानत हस कि पुराना जमाना ले येह कइसे हवय, याने जब ले धरती के ऊपर मनखे के सिरिस्टी करे गीस,

[5] दुस्टमन के खुसी ह थोरकून समय के अय, अऊ भक्तिहीन मनखेमन के आनंद छिन भर के होथे।

[6] हालाकि भक्तिहीन मनखे के घमंड ह अकास तक हबरथे अऊ ओकर मुड़ ह बादरमन ला छूथे,

[7] पर ओह अपन खुद के संडास सहीं सदाकाल बर नास हो जाही; जऊन मन ओला देखे रिहिन, ओमन पुछहीं, ‘ओह कहां हवय?’

[8] सपना कस ओह उड़ जाथे, अऊ फेर कभू नइं मिलय, रात के एक दरसन कस ओह दूरिहा हो जाही।

[9] जऊन आंखी ह ओला देखे रिहिस, ओह ओला फेर नइं देखही; ओह अपन जगह म फेर नइं देखे जाही।

[10] ओकर लइकामन गरीबमन ले दया के आसा करहीं; ओकर खुद के हांथमन ओकर धन वापिस दीहीं।

[11] जऊन जवानी के बल ह ओकर हाड़ामन म भरे रहिथे, ओह ओकर संग धुर्रा म मिल जाही।

[12] “हालाकि बुरई ह ओकर मुहूं म मीठ लगथे अऊ ओह ओला अपन जीभ के तरी म लुकाके रखथे,

[13] हालाकि ओह ओला छोंड़े बर नइं चाहय अऊ ओला अपन मुहूं म रखे रहिथे,

[14] तभो ले ओकर जेवन ह पेट म करू हो जाही; येह ओकर भीतर म सांप के जहर हो जाही।

[15] जऊन धन ला ओह लील ले रिहिस, ओह ओला निकाल दीही; परमेसर ह ओला ओकर पेट म ले उल्टी करवा दीही।

[16] ओह सांपमन के जहर ला चुहकही; जहरिला सांप के दांतमन ओला मार डारहीं।

[17] ओह ओ झरना अऊ नदियामन के आनंद नइं उठा सकही, जेमा मंधरस अऊ दही के धार बोहावत हवय।

[18] जेकर बर ओह कठोर मेहनत करिस, ओला बिगर खाय ओह वापिस करही; ओह अपन धंधा ले मिले लाभ के आनंद नइं उठा सकही।

[19] काबरकि ओह कंगालमन ऊपर अतियाचार करे हवय अऊ ओमन ला बेसहारा छोंड़ दे हवय; ओह ओ घरमन ला हड़प ले हवय, जऊन ला ओह नइं बनाय रिहिस।

[20] “खचित, ओकर लालसा के कभू अन्त नइं होवय; ओह अपन धन के दुवारा अपनआप ला नइं बंचा सकय।

[21] खाय बर ओकर लिये कुछू नइं बांचे हवय; ओकर अमीरी ह बने नइं रहय।

[22] ओकर धन अऊ सफलता के समय म ओला दुख ह घेर लीही; दुरगति के जम्मो चीज ओकर ऊपर आ पड़ही।

[23] जब ओह अपन पेट ला भर चुके होही, तभे परमेसर ह अपन भारी रिस ला ओकर ऊपर देखाही अऊ ओकर ऊपर दुख ही दुख लानही।

[24] हालाकि ओह लोहा के हथियार ले बच निकलथे, फेर कांस के बान ह ओला छेद डारथे।

[25] ओह ये बान ला तीरके ओकर पीठ ले निकालथे, चिकचिकावत छोर ह ओकर करेजा ले बाहिर निकलथे। ओकर ऊपर आतंक छा जाही;

[26] ओकर धन-संपत्ति बर घिटके अंधियार ह बाट जोहथे। बिगर हवा के बरत आगी ह ओला भसम कर दीही अऊ ओकर डेरा म बांचे चीजमन ला नास कर दीही।

[27] अकास ह ओकर अपराध ला परगट करही; धरती ह ओकर बिरोध म ठाढ़ होही।

[28] पानी के बाढ़ ह ओकर घर ला बोहाके ले जाही, परमेसर के रिस के दिन ओकर पूंजी ह बोहा जाही।

[29] परमेसर ह दुस्ट मनखे के हालत अइसने करथे, परमेसर कोति ले ओमन बर ये किसम के उत्तराधिकार ठहिराय गे हवय।”

अयूब — Chapters