[1] मोर मन ह टूट गे हवय, मोर जीये के दिनमन ला कम कर दिये गे हवय, कबर ह मोला अगोरत हे।
[2] खचित ठट्ठा करइयामन मोर चारों कोति हवंय; मोर आंखीमन ओमन के बईरता ला देखत हवंय।
[3] “हे परमेसर, मोला छोंड़ाय बर जमानत दे। अऊ कोन हवय, जऊन ह मोर बर ठाढ़ होही?
[4] तेंह ओमन के समझ के सक्ति ला बंद कर दे हवस; एकरसेति तेंह ओमन ला जीते बर नइं देवस।
[5] कहूं कोनो अपन लाभ बर अपन संगीमन के चारी-चुगली करथे, त ओकर लइकामन के आंखीमन फूट जाहीं।
[6] “परमेसर ह मोला जम्मो झन बर एक कहावत बना दे हवय, अऊ मेंह अइसे मनखे हो गे हवंव, जेकर चेहरा म मनखेमन थूकथें।
[7] मोर आंखीमन दुख के कारन धुंधला गे हवंय; मोर जम्मो देहें ह छइहां कस कमजोर हो गे हवय।
[8] सीधवा मनखेमन येला देखके अचम्भो करथें; अऊ निरदोस मनखेमन भक्तिहीन मनखेमन के बिरोध म भड़कथें।
[9] तभो ले, धरमीमन अपन रद्दा ला धरे रहिहीं, अऊ सुध काम करइया मनखेमन मजबूत होवत जाहीं।
[10] “पर आवव, तुमन जम्मो झन, फेर कोसिस करव! पर तुम्हर बीच म, मेंह एको झन ला बुद्धिमान नइं पाहूं।
[11] मोर जीये के दिनमन तो बीत गीन, मोर योजनामन छितिर-बितिर हो गे हवंय। मोर हिरदय के ईछामन चले गे हवंय
[12] ओमन रथिया ला दिन म बदल देथें; अंजोर ह अंधियार के लकठा म हवय।
[13] कहूं मेंह कोनो घर के आसा करंव, त ओह सिरिप कबर अय, कहूं मेंह अंधियार के जगह म अपन बिस्तर ला बिछावंव,
[14] कहूं मेंह भ्रस्ट काम ला कहंव, ‘तें मोर ददा अस,’ अऊ कीरा ला कहंव, ‘तें मोर दाई अस’ या ‘मोर बहिनी अस,’
[15] त फेर मोर आसा कहां हवय— कोन ह मोर आसा ला देख सकथे?
[16] का मोर आसा ह मिरतू के कपाट करा खाल्हे चल दीही? का हमन खाल्हे जाके एके संग धुर्रा म मिल जाबो?”