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[1] तब अयूब ह जबाब दीस:

[2] “मोर गोठ ला धियान देके सुनव; ये किसम ले तुमन मोला सांतवना दे सकत हव।

[3] मोर गोठ के पूरा होवत ले धीरज धरव, अऊ जब मेंह गोठिया लेवंव, त फेर मोर हंसी उड़ावव।

[4] “का मोर सिकायत कोनो मनखे ले हवय? फेर मेंह अधीर काबर नइं होवंव?

[5] मोला देखव अऊ अचम्भो करव; अपन मुहूं ला अपन हांथ ले छबकव।

[6] जब में येकर बारे म सोचथंव, त मोर म भय छा जाथे; मोर देहें ह थर-थर कांपे लगथे।

[7] दुस्ट मनखेमन काबर जीयत रहिथें, जबकि डोकरा होवत ओमन के ताकत ह बढ़त जाथे?

[8] ओमन अपन लइकामन ला अपन चारों कोति बसत देखथें, अऊ ओमन अपन नाती-पोतामन ला अपन आंखी ले बढ़त देखथें।

[9] ओमन के घर सुरकछित रहिथे अऊ उहां डर नइं रहय; परमेसर के सजा के छड़ी ओमन ऊपर नइं परय।

[10] ओमन के सांड़मन गाभिन करे म कभू नइं चुकंय; ओमन के गायमन बछरू जनमथें अऊ गरभ ला नइं गिरावंय।

[11] ओमन अपन लइकामन ला बरदी के रूप म भेजथें; ओमन के छोटे लइकामन नाचथें।

[12] ओमन खंजरी अऊ बीना के धुन म गाथें; ओमन बंसी के धुन म खुसी मनाथें।

[13] ओमन अपन जिनगी के दिन सम्पन्नता म बिताथें अऊ सांति म मरथें।

[14] तभो ले ओमन परमेसर ला कहिथें, ‘हमन ला अकेला छोंड़ दे! हमन तोर रद्दा ला जाने के ईछा नइं रखन।

[15] सर्वसक्तिमान कोन ए कि हमन ओकर सेवा करन? ओकर ले पराथना करके हमन ला का मिलही?’

[16] पर ओमन के सम्पन्नता ओमन के हांथ म नइं ए, एकरसेति मेंह दुस्टमन के योजना ले दूरिहा रहिथंव।

[17] “तभो ले दुस्टमन के दीया ह कतेक बार बुताथे? ओमन ऊपर कतेक बार बिपत्ति पड़थे, परमेसर ह अपन रिस म ओमन ला दुख देथे?

[18] ओमन कतेक बार हवा के आघू म भूंसा कस होथें, गरेर के दुवारा उड़ियाय भूंसा कस होथें?

[19] ये कहे जाथे, ‘परमेसर ह दुस्टमन के सजा ला ओमन के लइकामन बर कुढ़ोके रखथे।’ ओला दुस्टमन ले बदला लेवन दव, ताकि ओमन खुद अनुभव करंय!

[20] ओमन अपनेच आंखी ले अपन बिनास ला देखंय; ओमन सर्वसक्तिमान के कोरोध ला झेलंय।

[21] काबरकि ओमन अपन बाद अपन परिवार के का फिकर करथें जब ओमन ला दिये गय समय ह खतम हो जाथे?

[22] “का कोनो मनखे परमेसर ला गियान दे सकथे, ये जानत कि ओह सबले बड़े पदवाला के घलो नियाय करथे?

[23] एक मनखे अपन पूरा बल सहित मरथे, पूरा सुरकछित अऊ अराम से,

[24] अपन देहें ला पुस्ट करके, अऊ हाड़ामन ला मजबूत करके।

[25] आने मनखे ह अपन जीव के करूवाहट म मरथे, ओह कभू कोनो बने चीज के आनंद नइं उठावय।

[26] एक के बाजू म एक, ओमन धुर्रा म लेटे रहिथें, अऊ कीरामन ओ दूनों ला ढांक लेथें।

[27] “मेंह बने करके जानत हंव कि तुमन का सोचत हव, ओ चलाकी, जेकर दुवारा तुमन मोला गलत ठहिराहू।

[28] तुमन पुछथव, ‘अब ओ बड़े मनखे के घर कहां हवय, ओ डेरामन जिहां दुस्ट मनखेमन निवास करिन?’

[29] का कभू तुमन ओमन ले सवाल करेव, जऊन मन डहार रेंगथें? का तुमन ओमन के लेखा-जोखा ला धियान नइं दे हवव—

[30] कि दुस्टमन बिपत्ति के दिन ले बचाय जावत हें, कि ओमन परलय के दिन ले छुटकारा पावत हें?

[31] कोन ह ओमन के मुहूं के आघू म ओमन के चालचलन के बुरई करही? ओमन जऊन काम करे हवंय, ओकर बदला कोन लीही?

[32] ओमन ला कबर म अमराय जाथे, अऊ ओमन के कबर के रखवारी करे जाथे।

[33] घाटी के माटी ह ओमन ला गुरतूर लगथे; हर एक जन ओमन के पाछू-पाछू जाथें, अऊ अनगिनत मनखेमन ओमन के आघू-आघू जाथें।

[34] “एकरसेति तुमन अपन बेकार के बात ले मोला कइसे सांतवना दे सकत हव? तुमन के जबाब म लबारी ही लबारी हवय!”

अयूब — Chapters