Skip to content
Opens in a new window
Listen to this chapter • 2:01

[1] तब एलीहू ह ये घलो कहिस:

[2] “का तेंह येला नियाय-संगत मानथस? तेंह कहिथस, ‘मेंह सही अंव, परमेसर नइं।’

[3] तभो ले तेंह ओकर ले पुछथस, ‘मोला येकर ले का फायदा, पाप नइं करे ले मोला का मिलत हे?’

[4] “मेंह तोला अऊ तोर संगीमन ला जबाब देय चाहत हंव।

[5] अकासमन कोति निहार अऊ देख; बादरमन कोति निहार, जऊन मन तोर बहुंत ऊपर हवंय।

[6] कहूं तेंह पाप करथस, त परमेसर के का बिगड़थे? कहूं तोर पापमन बहुंते हवंय, त येकर ले ओला का फरक पड़थे?

[7] कहूं तेंह धरमी अस, त तेंह ओला का देथस? या ओला तोर हांथ ले का मिल जाथे?

[8] तोर दुस्टता ह सिरिप तोर सहीं मनखेमन ऊपर, अऊ तोर धरमीपन ह आने मनखेमन ऊपर असर डालथे।

[9] “अब्बड़ अतियाचार के कारन मनखेमन कलहरथें; ओमन बलवान के बाहुबल ले छुटकारा पाय बर बिनती करथें।

[10] पर कोनो नइं कहय, ‘मोर सिरजनहार परमेसर कहां हवय, जऊन ह रथिया गीत गाय बर देथे,

[11] जऊन ह हमन ला धरती के जानवरमन ले जादा सिकछा देथे अऊ हमन ला अकास के चिरईमन ले जादा बुद्धिमान बनाथे।’

[12] दुस्ट मनखेमन के घमंड के कारन परमेसर जबाब नइं देवय, जब मनखेमन गोहारथें।

[13] वास्तव म, परमेसर ह ओमन के खाली निबेदन ला नइं सुनय; सर्वसक्तिमान ह ओकर कोति धियान नइं देवय।

[14] त ओह तोर का सुनही जब तेंह कहिथस कि मेंह ओला नइं देखत हंव, जबकि तोर मामला ओकर आघू म हवय, अऊ तोला ओकर बाट जोहना जरूरी अय।

[15] अऊ देख, ओह गुस्सा होके कभू दंड नइं देवय अऊ ओह दुस्टता कोति कम धियान नइं देवय।

[16] एकरसेति अयूब ह बेकार के बात कहे बर अपन मुहूं खोलथे; बिगर गियान के, ओह बहुंत गोठियाथे।”

अयूब — Chapters