[1] “पर अब ओमन ही मोर हंसी उड़ाथें, ओ मनखे जऊन मन उमर म मोर ले छोटे हवंय, जऊन मन के ददामन ला मेंह अपन भेड़मन के रखवार कुकुरमन संग रखे के लईक घलो नइं समझत रहेंव।
[2] ओमन के भुजा के बल ह मोर का काम के रिहिस, जब ओमन के ताकत ह खतम हो गे रिहिस?
[3] गरीबी अऊ भूख ले दुबर-पातर, ओमन बीरान अऊ बेकार पड़े भुइयां म रथिया के बेरा भटकत रिहिन।
[4] ओमन झाड़ी के बीच म लोनिया साग टोरिन, अऊ ओमन के जेवन, बहरी बनाय के झाड़ी के जरी रिहिस।
[5] ओमन ला समाज ले निकाल देय गे रिहिस, मनखेमन ओमन ऊपर अइसे चिचियावंय, जइसे चोर ऊपर चिचियाथें।
[6] ओमन ला डरावनी घाटीमन म, चट्टानमन के बीच म अऊ भुइयां के बिलमन म रहे ला परय।
[7] ओमन झाड़ीमन के बीच म पसु सहीं चिचियावंय अऊ रूख के खाल्हे उगे झाड़ीमन म भीड़ लगावंय।
[8] ओमन नीच अऊ अनामी संतान रिहिन, जेमन ला देस ले निकाल देय जावय।
[9] “अब ओ जवानमन गीत गाके मोर हंसी उड़ाथें; मेंह ओमन के बीच म एक नारा बन गे हवंव।
[10] ओमन मोर ले घिन करथें अऊ मोर ले दूरिहा रहिथें; ओमन मोर मुहूं ऊपर थूके म संकोच नइं करंय।
[11] काबरकि परमेसर ह मोला सक्तिहीन कर दे हवय अऊ मोला पीरा दे हवय, ओमन मोर आघू म बिगर लगाम के हो जाथंय।
[12] मोर जेवनी कोति बरदी के बरदी चढ़ई करथें; ओमन मोर गोड़ बर फांदा लगाथें, ओमन मोर बिरोध म अपन घेराबंदी के ढलान बनाथें।
[13] ओमन मोर डहार ला काटके बंद कर देथें; ओमन मोला नास करे म सफल होथें। ओमन कहिथें, ‘ओकर मदद कोनो झन करंय।’
[14] दरार म ले बुलकके आय सहीं ओमन आघू बढ़थें; बिनास के बीच म ओमन उंडलत आथें।
[15] आतंक ह मोर ऊपर छा गे हवय; मोर मान-सम्मान ह हवा कस उड़िया गे हवय, मोर सुरकछा ह बादर कस गायब हो गे हवय।
[16] “अब मोर जिनगी ह घटत हवय; दुख के दिनमन मोला जकड़ ले हवंय।
[17] रथिया ह मोर हाड़ामन ला भेद देथे; मोर अब्बड़ पीरा ह कभू बंद नइं होवय।
[18] परमेसर ह अपन बड़े सामर्थ म मोर ओनहा ला पकड़थे; ओह मोर कुरता के कालर कस मोला लपेटथे।
[19] ओह मोला चीखला म फटिकथे, अऊ मेंह धुर्रा अऊ राख कस हो गे हंव।
[20] “हे परमेसर, में तोला पुकारथंव, पर तेंह जबाब नइं देवस; मेंह ठाढ़ होथंव, पर तेंह सिरिप मोला देखथस।
[21] तें मोर बर कठोर हो गे हस; अपन भुजा के बल ले मोला सताथस।
[22] तेंह मोला उठाके हवा म उड़िया देथस; तेंह मोला आंधी म उछाल देथस।
[23] मेंह जानत हंव तेंह मोला मिरतू करा ले आबे, ओ जगह जऊन ह जम्मो जीयत परानीमन बर ठहिराय गे हवय।
[24] “खचित कोनो टूटे मनखे कोति हांथ नइं बढ़ावय जब ओह अपन बिपत्ति के समय मदद बर गोहारथे।
[25] का मेंह ओमन बर नइं रोयेंव, जऊन मन समस्या म रिहिन? का गरीबमन बर मोर आतमा ह दुखी नइं होईस?
[26] तभो ले जब मेंह भलई के आसा करेंव, त बुरई ह आईस; जब मेंह अंजोर के बाट जोहत रहेंव, त अंधियार आईस।
[27] मोर भीतर म उथल-पुथल कभू बंद नइं होवय; दुख के दिनमन मोर ऊपर आ गे हवंय।
[28] मेंह करिया होवत हंव, पर सूरज के दुवारा नइं; मेंह सभा म ठाढ़ होके मदद बर गोहारथंव।
[29] मेंह गीदड़मन के भाई, अऊ उल्लू चिरईमन के संगी बन गे हवंव।
[30] मोर चमड़ी ह करिया होके गिरत हवय; मोर देहें ह जर-बुखार म जरत हवय।
[31] मोर बीना ले बिलाप के सुर, अऊ मोर बंसी ले रोये के अवाज निकलत हवय।