[1] तब तेमान के रहइया एलीपज ह जबाब दीस:
[2] “का बुद्धिमान मनखे बिगर सोचे-बिचारे जबाब दीही या गरम पूरबी पवन ले अपन पेट भरही?
[3] का ओमन बेकार के गोठ ले बहस करहीं या बेमतलब के बात संग बहस करहीं?
[4] पर तेंह परमेसर के आदर ला कम करथस अऊ परमेसर के भक्ति म बाधा डालथस।
[5] तोर पाप ह तोर मुहूं ला गोठियाय बर उकसावत हे; तेंह चतुरामन के भासा म बातचीत करथस।
[6] मेंह नइं, पर तोर खुद के मुहूं के गोठ ह तोला दोसी ठहिरात हे; तोर खुद के जीभ ह तोर बिरोध म गवाही देवत हे।
[7] “का जम्मो मनखे म सबले पहिली तेंह जनमे? का परबतमन ले पहिली तोला बनाय गीस?
[8] का तें परमेसर के सभा म बईठके सुनथस? का सिरिप तोरेच करा बुद्धि हवय?
[9] तेंह अइसे का जानथस, जऊन ला हमन नइं जानन? तोर म अइसे कोन समझ के बात हवय, जऊन ह हमन म नइं ए?
[10] पाके चुंदीवाला अऊ सियानमन हमर तरफ हवंय, अऊ त अऊ तोर ददा ले घलो जादा उमर के मनखेमन।
[11] का परमेसर के ढाढ़स देवई, अऊ कहे गे कोमल बचन तोर बर परयाप्त नो हंय?
[12] तोर मन ह तोला काबर आने कोति लेगत हे, अऊ रिस म तोर आंखीमन काबर चमकत हवंय,
[13] कि तेंह अपन गुस्सा ला परमेसर के बिरोध म परगट कर अऊ अपन मुहूं ले अइसने बचन निकलन देय?
[14] “मरनहार मनखे ह का अय कि ओह सुध हो सकय या माईलोगन ले जनमे मनखेमन कोन अंय कि ओमन धरमी हो सकंय?
[15] यदि परमेसर ह अपन पबितर मनखेमन ऊपर भरोसा नइं करय, अऊ यदि स्वरगमन घलो ओकर नजर म सुध नइं अंय,
[16] त फेर मरनहार मनखेमन के का हिसाब, जऊन मन दुस्ट अऊ भ्रस्ट अंय, अऊ अधरम के काम करे बर पीयासन रहिथें!
[17] “मोर बात ला सुन अऊ मेंह तोला समझाहूं; मेंह तोला बतात हंव कि मेंह का देखे हंव,
[18] ओ बात जऊन ला बुद्धिमान मनखेमन अपन पुरखामन ले पाय रिहिन, ओला बिगर छुपाय बताय हवंय,
[19] (सिरिप पुरखामन ला देस दिये गे रिहिस जब कोनो परदेसी के ओमन के बीच म आना-जाना नइं रिहिस):
[20] दुस्ट मनखे ह अपन जिनगी भर पीरा सहथे, अऊ निरदयी मनखे बर येह ओकर जिनगी भर बने रहिथे।
[21] भयभीत करइया अवाज ओकर कान म गूंजत रहिथे; जब सब सही जान पड़थे, तभे बिनास करइयामन ओकर ऊपर आ जाथें।
[22] ओला अंधियार म ले बच निकले के बिसवास नइं रहय; अऊ तलवार ले ओकर मारे जवई ह खचित ए।
[23] ओह गिधवा के सहीं जेवन बर एती-ओती किंदरत रहिथे; ओह जानथे कि अंधियार के दिन ह तीरेच म हवय।
[24] पीरा अऊ बिपत्ति के भय ले ओह भरे रहिथे; दुख-समस्या ले ओह बियाकुल रहिथे, जइसे कोनो राजा चढ़ई करे बर तियार हवय,
[25] काबरकि ओह परमेसर के ऊपर मुक्का तानथे अऊ सर्वसक्तिमान परमेसर के बिरोध म अपन डींग मारथे,
[26] अऊ ओकर बिरोध म उतावला होके एक मोटा अऊ मजबूत ढाल लेके ओकर ऊपर धावा बोलथे।
[27] “हालाकि ओकर चेहरा म चरबी बड़ गे हवय अऊ ओकर कनिहां ह मांस भरे ले मोटा हो गे हवय,
[28] पर ओह उजरे नगरमन म अऊ ओ घरमन म रहिही जिहां कोनो नइं रहंय, अऊ जिहां घर के दीवारमन कुटा-कुटा होके गिरथें।
[29] ओह अऊ धनवान नइं रहिही अऊ ओकर धन बने नइं रहय, ओकर धन ह देस म नइं फईलही।
[30] ओह अंधियार ले नइं बांच पाही; आगी के जुवाला ले ओकर पीकामन झुलस जाहीं, अऊ परमेसर के मुहूं के सांस ले ओह दूरिहा छिटक जाही।
[31] ओह बेकार के बातमन म भरोसा करके अपनआप ला धोखा झन देवय, काबरकि ओकर बलदा म ओला कुछू नइं मिलय।
[32] अपन समय के पहिली ओह मुरझा जाही, अऊ ओकर डारामन नइं बड़हीं।
[33] ओह ओ अंगूर के नार सहीं होही जेकर कइंचा अंगूरमन झरके गिर जाथें, या ओह ओ जैतून रूख सहीं होही जेकर फूलमन झरके गिरत हवंय।
[34] काबरकि भक्तिहीन के संगति म रहइया बिगर फर के होही, अऊ घूसखोरमन के डेरामन ला आगी ह भसम कर दीही।
[35] ओमन समस्या खड़े करे के योजना बनाथें अऊ दुस्ट काम करथें; ओमन के मन म धोखाधड़ी के बिचार रहिथे।”