Skip to content
Opens in a new window
Listen to this chapter • 3:01

[1] अऊ अयूब ह अपन बात ला आगे कहिस:

[2] “जीयत परमेसर के किरिया, जऊन ह मोला नियाय नइं दे हवय, ओ सर्वसक्तिमान, जऊन ह मोर जिनगी ला करू कर दे हवय,

[3] जब तक मोर म परान हवय, परमेसर के सांस ह मोर नाक म चलत हवय,

[4] तब तक मेंह मोर मुहूं ले कोनो खराप बात नइं गोठियावंव, अऊ मोर जीभ ले लबारी बात नइं निकलय।

[5] मेंह कभू नइं मानंव कि तुमन सही अव; मेंह अपन मरत ले अपन ईमानदारी नइं छोड़ंव।

[6] मेंह अपन धरमीपन ला बनाय रखहूं अऊ एकर ले बाहिर नइं जावंव; जब तक मेंह जीयत हंव मोर बिबेक ह मोला नइं धिक्कारय।

[7] “मोर बईरी ह दुस्ट मनखे कस, अऊ मोर बिरोधी ह अनियायी कस ठहिरय!

[8] जब भक्तिहीन मनखेमन मर जाथें, त ओमन करा का आसा रहिथे, याने कि जब परमेसर ह ओमन के परान ला ले लेथे?

[9] जब ओमन ऊपर संकट आथे, त का परमेसर ह ओमन के गोहार ला सुनथे?

[10] का ओमन ला सर्वसक्तिमान म खुसी मिलही? का ओमन परमेसर ला हर समय गोहारहीं?

[11] “मेंह तुमन ला परमेसर के सामर्थ के बारे म सिखाहूं; सर्वसक्तिमान के रद्दा ला मेंह नइं छुपावंव।

[12] तुमन जम्मो ये बात ला देख डारे हव। त फेर ये बेकार के बात काबर करत हव?

[13] “दुस्ट मनखे के बांटा म परमेसर ह ये चीज देथे, निरदयी मनखे ला सर्वसक्तिमान ले पुरखा के ये पूंजी मिलथे:

[14] चाहे ओकर कतको लइका रहंय, ओमन तलवार ले घात करे जाहीं; ओकर संतानमन ला कभू पेट भर जेवन नइं मिलय।

[15] ओकर जऊन मनखेमन बांच जाहीं, ओमन महामारी ले मर जाहीं, अऊ ओमन के बिधवामन ओमन बर नइं रोहीं।

[16] हालाकि ओह चांदी ला धुर्रा कस कुढ़ोथे अऊ ओनहा ला माटी कस ढेर लगाथे,

[17] पर जऊन ओनहा के ढेर ओह लगाथे, ओला धरमी मनखे ह पहिरही, अऊ निरदोस मनखेमन ओकर चांदी ला बांट लीहीं।

[18] जऊन घर ओह बनाथे, ओह कीरा के घरौंदा कस अय, या ओह रखवार के बनाय एक झोपड़ी कस अय।

[19] ओह धनी होके सुतथे, पर अब अइसने नइं कर सकही; जब ओह सुतके उठथे, त जम्मो ह खतम हो गे रहिथे।

[20] आतंक ह ओला बाढ़ कस घेर लेथे; गरेर ह ओला रथिया उड़िया ले जाथे।

[21] पुरवई हवा ह ओला उड़िया ले जाथे, अऊ ओह नइं रहय; येह ओला ओकर घर ले झपटके ले जाथे।

[22] ओ हवा ह बिगर दया के ओला ओकर बिरूध उठाके फटिकथे; ओह ओ हवा के सक्ति ले तेजी से भागथे।

[23] येह हंसी उड़ाय सहीं ताली बजाथे अऊ फुफकारके ओला ओकर जगह ले हटा देथे।”

अयूब — Chapters