[1] तब अयूब ह कहिस:
[2] “यदि मोर पीरा ला तऊले जातिस अऊ मोर दुरगति ला तराजू म मढ़ाय जातिस!
[3] त खचित येह समुंदर के बालू ले जादा भारी होतिस— कोनो अचम्भो के बात नो हय कि मेंह अपन गोठ म उतावला हो गे हंव।
[4] सर्वसक्तिमान परमेसर के बानमन मोला बेधे हवंय, मोर आतमा ह ओमन के जहर ला पीयथे; परमेसर के आतंक ह मोर बिरोध म ठाढ़े हवय।
[5] का जंगली गदहा ह रेंकथे, जब ओकर करा खाय बर कांदी रहिथे, या का बईला ह नरियाथे, जब ओकर करा चारा रहिथे?
[6] का बिगर सुवादवाले जेवन ला बिगर नून के खाय जाथे, या दवाई के पऊधा के रस म कोनो सुवाद होथे?
[7] मेंह येला छुये बर घलो नइं चाहंव; अइसने जेवन ह मोला बिमरहा कस घिन लगथे।
[8] “बने होतिस, कि मोर बिनती ह सुने जातिस, अऊ जऊन बात के मेंह आसा करथंव, परमेसर ह ओला पूरा करतिस,
[9] कि परमेसर ह मोला कुचर डारे के ईछा करतिस, अऊ ओह अपन हांथ ला बढ़ाके मोर परान ला ले लेतिस!
[10] तब मोला ये बात म ढाढ़स होतिस— अब्बड़ पीरा म मोला आनंद होतिस— कि मेंह ओ पबितर परमेसर के बचन ला इनकार नइं करेंव।
[11] “मोर म बल ही कहां हवय कि में अब भी आसा करंव? मोर सोच-बिचार ही का अय कि में धीरज धरंव?
[12] का मोर बल पथरा कस हवय? का मोर देहें ह कांसा कस हवय?
[13] का मोर करा अपनआप के मदद करे बर कोनो सक्ति हवय? का सफलता ह मोर ले दूरिहा नइं हो गे हवय?
[14] “जऊन ह अपन संगी ऊपर दया नइं करय, ओह सर्वसक्तिमान के भय मानना छोंड़ देथे।
[15] पर मोर भाईमन समय-समय म बोहावत ओ नरवामन कस दगाबाज अंय, जऊन मन छलकत बहथें
[16] जब पिघलत बरफ के दुवारा मतलहा हो जाथें अऊ टघले बरफ ह ओमा मिल जाथे।
[17] पर सूखा समय म ओमन के बहना बंद हो जाथे, अऊ गरमी म ओमन अपन जगह ले गायब हो जाथें।
[18] यातरा करइया दलमन अपन रसता ले भटक जाथें; ओमन भटकके सुनसान जगह म चल देथें अऊ नास हो जाथें।
[19] तेमा के यातरा करइया दलमन पानी खोजथें, सेबा नांव के जगह के यातरा करइया बेपारीमन ओकर आसा करत रहिथें।
[20] ओमन ला निरासा होथे, काबरकि ओमन भरोसा रखे रिहिन; ओमन उहां हबरिन, त ओमन ला निरासा होईस।
[21] वइसने तुमन घलो साबित कर दे हव कि तुमन मोर कोनो मदद नइं कर सकव; तुमन मोर बिपत्ति ला देखके डरा गे हवव।
[22] का मेंह कभू कहेंव, ‘मोर कोति ले कुछू देवव, अपन संपत्ति म ले मोर बर एक छुड़ौती दव,
[23] बईरी के हांथ ले मोला बचा लेवव, निरदयी के पकड़ ले मोला छोंड़ावव?’
[24] “मोला सिखावव अऊ मेंह चुपेचाप रहिहूं; मोला बतावव कि मेंह का गलती करे हंव।
[25] खर्रा बोली ह कतेक पीरा देवइया होथे! पर तुमन के बहस ह का साबित करथे?
[26] का तुमन मोर कहे गोठ ला सुधारे चाहत हव, अऊ मोर निरासा के गोठमन ला हवा के सहीं समझत हव?
[27] तुमन तो अनाथमन ला गुलाम बनाय बर परची निकालहू, अऊ अपन संगी ला घलो दाम लेके बदल डारहू।
[28] “पर अब किरपा करके मोर कोति देखव। का मेंह तुम्हर आघू म लबारी मारहूं?
[29] नरम बनव, अनियायी झन होवव; फेर बिचार करव, काबरकि मोर ईमानदारी ह संकट म हवय।
[30] का मोर गोठ म कोनो बुरई के बात हवय? का मेंह खराप भावना ला नइं चिन सकंव?