[1] एकर बाद, अयूब ह अपन मुहूं खोलके अपन जनम दिन ला धिक्कारे लगिस।
[2] ओह कहिस:
[3] “नास हो जावय ओ दिन, जऊन दिन मोर जनम होईस, अऊ ओ रात घलो जेह कहिस, ‘पेट म बाबू हवय!’
[4] ओ दिन ह अंधियार हो जावय; परमेसर ह ऊपर ले ओकर सुधि झन लेवय; ओकर ऊपर अंजोर झन होवय।
[5] दुख अऊ मिरतू के छइहां ह ओ दिन के ऊपर अधिकार करय; बादर ह ओकर ऊपर छाय रहय; दिन के अंधियार ह ओला डरावय।
[6] ओ रथिया ला घोर अंधियार ह जकड़ डारय, बछर के दिनमन म ओ दिन ला सामिल झन करे जावय अऊ कोनो महिना म ओ दिन के गनती झन होवय।
[7] ओ रथिया ह ठड़गी हो जावय; ओमा कोनो आनंद के धुन झन सुनई देवय।
[8] जऊन मन दिनमन ला धिक्कारथें, ओमन ओ दिन ला धिक्कारंय, जऊन मन लिबयातान ला उत्तेजित करे बर तियार हवंय।
[9] ओकर बिहनियां के तारामन अंधियार हो जावंय; ओह दिन के अंजोर बर तरसय अऊ ओ अंजोर ह झन आवय अऊ ओह बिहनियां के पहिली किरन ला झन देखे पावय,
[10] काबरकि ओ दिन ह मोर दाई के कोख ला मोर बर बंद नइं करिस कि मोर आंखीमन समस्या ला झन देखंय।
[11] “जनम के बेरा ही मेंह काबर नास नइं हो गेंव, अऊ गरभ ले निकलते ही मेंह काबर नइं मर गेंव?
[12] मोला थामे बर उहां माड़ीमन काबर रिहिन अऊ मोला दूध पीयाय बर ओ थनमन काबर रिहिन?
[13] कहूं अइसने नइं होतिस, त मेंह सांति म चुपेचाप पड़े रहितेंव; अऊ गहरी नींद म सुते अराम करतेंव,
[14] मेंह धरती के ओ राजामन अऊ सासन करइयामन संग होतेंव जऊन मन अपन बर ओ जगहमन ला बनाईन, जऊन मन अब खंडहर हो गे हवंय,
[15] या ओ राजकुमारमन संग होतेंव, जेमन करा सोन रिहिस, अऊ जऊन मन अपन घरमन ला चांदी ले भर ले रिहिन।
[16] या बिगर समय के गिरे गरभ के लइका सहीं मोला भुइयां म काबर तोपे नइं गीस, याने ओ लइका जऊन ह कभू दिन के अंजोर ला नइं देखिस?
[17] उहां दुस्ट मनखे के दुख देवई ह खतम हो जाथे, अऊ उहां थके-मांदे मनखेमन बिसराम पाथें।
[18] उहां बंधक बनाय गे मनखेमन घलो अपन सुख के आनंद उठाथें; ओमन ला बेगारी करवइयामन के ललकार ह सुनई नइं देवय।
[19] उहां छोटे-बड़े जम्मो झन रहिथें, अऊ गुलाममन अपन मालिक ले सुतंतर रहिथें।
[20] “ओमन ला अंजोर काबर दिये जाथे, जऊन मन दुख म हवंय, अऊ ओमन ला जिनगी काबर दिये जाथे, जऊन मन उदास हवंय?
[21] जऊन मन मऊत के कामना करथें, पर मऊत ओमन ला आवय नइं, जऊन मन गड़े खजाना ले घलो जादा मऊत के खोज करथें,
[22] जऊन मन कि खुसी अऊ आनंद ले भरे रहिथें, जब ओमन कबर म हबरथें?
[23] ओ मनखे ला जिनगी काबर दिये जाथे जेकर अगम के रद्दा ह लुकाय हवय, जेकर चारों कोति परमेसर ह घेरा बांधे हवय?
[24] काबरकि आह भरई ह हर दिन के मोर जेवन हो गे हवय; मोर रोवई ह पानी के धारा कस बोहावत रहिथे।
[25] जऊन बात ले मेंह डरावत रहेंव, ओही ह मोर ऊपर आ गे हवय; जऊन बात के मोला भय रिहिस, ओही ह मोर संग घटे हवय।
[26] मोला न तो सुख, न ही सांति हवय; न ही मोला अराम मिलत हवय, पर सिरिप दुख ही दुख मोर ऊपर आ गे हवय।”