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[1] याहवेह, आपने अपने देश पर कृपादृष्टि की है; आपने याकोब की समृद्धि को पुनस्थापित किया है.

[2] आपने अपनी प्रजा के अपराध क्षमा कर दिए हैं तथा उनके सभी पापों को ढांप दिया है.

[3] आपने अपना संपूर्ण कोप शांत कर दिया तथा आप अपने घोर रोष से दूर हो गए हैं.

[4] परमेश्वर, हमारे उद्धारकर्ता, हमारी समृद्धि पुनस्थापित कर दीजिए, हमारे विरुद्ध अपने कोप को मिटा दीजिए.

[5] क्या हमारे प्रति आपका क्रोध सदैव स्थायी रहेगा? क्या आप अपने क्रोध को सभी पीढ़ियों तक बनाए रहेंगे?

[6] क्या आप हमें पुन: जिलाऐंगे नहीं, कि आपकी प्रजा आप में प्रफुल्लित हो सके?

[7] याहवेह, हम पर अपना करुणा-प्रेम प्रदर्शित कीजिए, और हमें अपना उद्धार प्रदान कीजिए.

[8] जो कुछ याहवेह परमेश्वर कहेंगे, वह मैं सुनूंगा; उन्होंने अपनी प्रजा, अपने भक्तों के निमित्त शांति की प्रतिज्ञा की है. किंतु उपयुक्त यह होगा कि वे पुन: मूर्खता न करें.

[9] इसमें कोई संदेह नहीं कि उनकी ओर से उद्धार उन्हीं के लिए निर्धारित है, जो उनके श्रद्धालु हैं, कि हमारे देश में उनका तेज भर जाए.

[10] करुणा-प्रेम तथा सच्चाई संयुक्त हो गई हैं; धार्मिकता तथा शांति ने एक दूसरे का चुंबन ले लिया.

[11] पृथ्वी से सच्चाई उगती रही है, धार्मिकता स्वर्ग से यह देख रहे है.

[12] इसमें कोई संदेह नहीं कि याहवेह वही प्रदान करेंगे, जो उत्तम है, और धरती अपनी उपज देगी.

[13] धार्मिकता आगे-आगे चलेगा और वही हमारे कदम के लिए मार्ग तैयार करता है.

स्तोत्र — Chapters