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[1] बाबेल की नदी के तट पर बैठे हुए ज़ियोन का स्मरण कर हम रो रहे थे.

[2] वहां मजनू वृक्षों पर हमने अपने वाद्य टांग दिए थे.

[3] क्योंकि जिन्होंने हमें बंदी बनाया था, वे हमारा गायन सुनना चाह रहे थे और जो हमें दुःख दे रहे थे; वे हमसे हर्षगान सुनने की चाह कर रहे थे, “हमें ज़ियोन का कोई गीत सुनाओ!”

[4] प्रवास में हमारे लिए याहवेह का स्तवन गान गाना कैसे संभव हो सकता था?

[5] येरूशलेम, यदि मैं तुम्हें भूल जाऊं, तो मेरे दायें हाथ का कौशल जाता रहेगा.

[6] यदि मैं तुम्हारा स्मरण न करूं, यदि मैं येरूशलेम को अपने आनंद से श्रेष्ठतर न मानूं, मेरी जीभ तालू से जा चिपके.

[7] याहवेह, वह दिन स्मरण कीजिए जब एदोम के वंशज येरूशलेम के विरुद्ध एकत्र हो गए थे. वे कैसे चिल्ला रहे थे, “ढाह दो इसे, इसे नींव तक ढाह दो!”

[8] बाबेल की पुत्री, तेरा विनाश तो निश्चित है, धन्य होगा वह पुरुष, जो तुझसे उन अत्याचारों का प्रतिशोध लेगा जो तूने हम पर किए.

[9] धन्य होगा वह पुरुष, जो तेरे शिशुओं को उठाकर चट्टान पर पटक देगा.

स्तोत्र — Chapters