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[1] परमेश्वर हमारे आश्रय-स्थल एवं शक्ति हैं, संकट की स्थिति में सदैव उपलब्ध सहायक.

[2] तब हम भयभीत न होंगे, चाहे पृथ्वी विस्थापित हो जाए चाहे पर्वत महासागर के गर्भ में जा पड़ें,

[3] हां, तब भी जब समुद्र गरजना करते हुए फेन उठाने लगें और पर्वत इस उत्तेजना के कारण थर्रा जाएं.

[4] परमेश्वर के नगर में एक नदी है, जिसकी जलधारा में इस नगर का उल्लास है, यह नगर वह पवित्र स्थान है, जहां सर्वोच्च परमेश्वर निवास करते हैं.

[5] स्वयं परमेश्वर इस नगर में निवास करते हैं, तब इस नगर की क्षति होना असंभव है; हर एक अरुणोदय उसके लिए परमेश्वर की सहायता उपलब्ध रहती है.

[6] राष्ट्रों में खलबली मची हुई है, राज्य के लोग डगमगाने लगे; परमेश्वर के एक आह्वान पर, पृथ्वी पिघल जाती है.

[7] सर्वशक्तिमान याहवेह हमारे पक्ष में हैं; याकोब के परमेश्वर में हमारी सुरक्षा है.

[8] यहां आकर याहवेह के कार्यों पर विचार करो, पृथ्वी पर उन्होंने कैसा विध्वंस किया है.

[9] उन्हीं के आदेश से पृथ्वी के छोर तक युद्ध थम जाते हैं. वही धनुष को भंग और भाले को टुकड़े-टुकड़े कर देते हैं; वह रथों को अग्नि में भस्म कर देते हैं.

[10] “समस्त प्रयास छोड़कर यह समझ लो कि परमेश्वर मैं हूं; समस्त राष्ट्रों में मेरी महिमा होगी, समस्त पृथ्वी पर मेरी महिमा होगी.”

[11] सर्वशक्तिमान याहवेह हमारे पक्ष में हैं; याकोब के परमेश्वर में हमारी सुरक्षा है.

स्तोत्र — Chapters