Skip to content
Opens in a new window

[1] संपूर्ण पृथ्वी हर्षोल्लास में, परमेश्वर का जय जयकार करे!

[2] परमेश्वर की महिमा के तेज का गुणगान करो; उन्हें महिमा का भजन गाकर उनका स्तवन करो.

[3] परमेश्वर से कहो, “कैसे आश्चर्यजनक हैं आपके महाकार्य! ऐसा अतुलनीय है आपका सामर्थ्य, कि आपके शत्रु आपके सामने संकुचित होकर झुक जाते हैं.

[4] संपूर्ण पृथ्वी आपके सामने नतमस्तक हो जाती है; सभी देश आपका स्तवन गान करते हैं, वे आपकी महिमा का स्तवन गान करते हैं.”

[5] आकर स्वयं देख लो कि परमेश्वर ने क्या-क्या किया है, कैसे शोभायमान हैं मनुष्य के हित में किए गए उनके कार्य!

[6] उन्होंने समुद्र को सूखी भूमि में बदलकर दिया, जब वे नदी पार कर रहे थे तो उनके पांव सूखी भूमि पर पड़ रहे थे. आओ, हम प्रभु में आनंद मनाएं.

[7] सामर्थ्य में किया गया उनका शासन सर्वदा है, सभी राष्ट्र उनकी दृष्टि में बने रहते हैं, कोई भी उनके विरुद्ध विद्रोह का विचार न करे.

[8] सभी मनुष्यों, हमारे परमेश्वर का स्तवन करो, उनके स्तवन का नाद सर्वत्र सुनाई दे;

[9] उन्होंने ही हमारे जीवन की रक्षा की है तथा हमारे पांवों को फिसलने से बचाया है.

[10] परमेश्वर, आपने हमारी परीक्षा ली; आपने हमें वैसे ही परिशुद्ध किया है, जैसे चांदी को शुद्ध किया जाता है.

[11] आपने हमें उलझन की परिस्थिति में डालकर, हमारी पीठ पर बोझ लाद दिए.

[12] आपने हमारे शत्रुओं को हमारे सिर कुचलते हुए जाने दिया; हमें अग्नि और जलधारा में से होकर जाना पड़ा, किंतु अन्ततः आपने हमें समृद्ध भूमि पर ला बसाया.

[13] मैं आपके मंदिर में अग्निबलि के साथ प्रवेश करूंगा, और आप से की गई अपनी प्रतिज्ञाएं पूर्ण करूंगा.

[14] वे सभी प्रतिज्ञाएं, जो विपत्ति के अवसर पर स्वयं मैंने अपने मुख से की थी.

[15] मैं आपको पुष्ट पशुओं की बलि अर्पित करूंगा, मैं मेढ़ों, बछड़ों और बकरों की बलि अर्पित करूंगा.

[16] परमेश्वर के सभी श्रद्धालुओ, आओ और सुनो; मैं उन महाकार्य को लिखा करूंगा, जो मेरे हित में परमेश्वर द्वारा किए गए हैं.

[17] मैंने उन्हें पुकारा, मेरे ओंठों पर उनका गुणगान था.

[18] यदि मैंने अपने हृदय में अपराध को संजोए रखकर, उसे पोषित किया होता तो परमेश्वर ने मेरी पुकार न सुनी होती;

[19] किंतु परमेश्वर ने न केवल मेरी प्रार्थना सुनी; उन्होंने उसका उत्तर भी दिया है.

[20] धन्य हैं परमेश्वर, जिन्होंने मेरी प्रार्थना सुनकर उसे अस्वीकार नहीं किया, और न मुझे अपने करुणा-प्रेम से छीन लिया!

स्तोत्र — Chapters