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[1] परमेश्वर, अपने करुणा-प्रेम में, अपनी बड़ी करुणा में; मुझ पर दया कीजिए, मेरे अपराधों को मिटा दीजिए.

[2] मेरी समस्त अधर्म को धो दीजिए और मुझे मेरे पाप से शुद्ध कर दीजिए.

[3] मैंने अपने अपराध पहचान लिए हैं, और मेरा पाप मेरे दृष्टि पर छाया रहता है.

[4] वस्तुतः मैंने आपके, मात्र आपके विरुद्ध ही पाप किया है, मैंने ठीक वही किया है, जो आपकी दृष्टि में बुरा है; तब जब आप अपने न्याय के अनुरूप दंड देते हैं, यह हर दृष्टि से न्याय संगत एवं उपयुक्त है.

[5] इसमें भी संदेह नहीं कि मैं जन्म के समय से ही पापी हूं, हां, उसी क्षण से, जब मेरी माता ने मुझे गर्भ में धारण किया था.

[6] यह भी बातें है कि आपकी यह अभिलाषा है, कि हमारे आत्मा में सत्य हो; तब आप मेरे अन्तःकरण में भलाई प्रदान करेंगे.

[7] जूफ़ा पौधे की टहनी से मुझे स्वच्छ करें, तो मैं शुद्ध हो जाऊंगा; मुझे धो दीजिए, तब मैं हिम से भी अधिक श्वेत हो जाऊंगा.

[8] मुझमें हर्षोल्लास एवं आनंद का संचार कीजिए; कि मेरी हड्डियां जिन्हें आपने कुचल दिया है, मगन हो उठें.

[9] मेरे पापों को अपनी दृष्टि से दूर कर दीजिए और मेरे समस्त अपराध मिटा दीजिए.

[10] परमेश्वर, मुझमें एक शुद्ध हृदय को उत्पन्न कीजिए, और मेरे अंदर में सुदृढ़ आत्मा की पुनस्थापना कीजिए.

[11] मुझे अपने सान्निध्य से दूर न कीजिए और न मुझसे आपके पवित्रात्मा को न छीनिए.

[12] अपनी उद्धार का उल्लास मुझमें पुन: संचारित कीजिए, और एक तत्पर आत्मा प्रदान कर मुझमें नवजीवन का संचार कीजिए.

[13] तब मैं अपराधियों को आपकी नीतियों की शिक्षा दे सकूंगा, कि पापी आपकी ओर पुन: फिर सकें.

[14] परमेश्वर, मेरे छुड़ानेवाला परमेश्वर, मुझे रक्तपात के दोष भाव से मुक्त कर दीजिए, कि मेरी जीभ आपकी धार्मिकता का स्तुति गान कर सके.

[15] प्रभु, मेरे ओंठों को खोल दीजिए, कि मेरे मुख से आपकी स्तुति-प्रशंसा हो सके.

[16] आपकी प्रसन्नता बलियों में नहीं है, अन्यथा मैं बलि अर्पित करता, अग्निबलि भी आपको प्रसन्न नहीं.

[17] टूटी आत्मा ही परमेश्वर के लिए उपयुक्त बलि है; टूटा और पछताया हुआ हृदय को, हे परमेश्वर, आप घृणा नहीं करते हैं.

[18] ज़ियोन की समृद्धि पर आपकी कृपादृष्टि हो, येरूशलेम की शहरपनाह का पुनर्निर्माण हो.

[19] तब धर्मी की अग्निबलि तथा सर्वांग पशुबलि अर्पण से आप प्रसन्न होंगे; और आपकी वेदी पर बैल अर्पित किए जाएंगे.

स्तोत्र — Chapters