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[1] याहवेह के प्रति आभार व्यक्त करो, उनको पुकारो; सभी राष्ट्रों के सामने उनके द्वारा किए कार्यों की घोषणा करो.

[2] उनकी प्रशंसा में गाओ, उनका गुणगान करो; उनके सभी अद्भुत कार्यों को वर्णन करो.

[3] उनके पवित्र नाम पर गर्व करो; उनके हृदय, जो याहवेह के खोजी हैं, उल्‍लासित हों.

[4] याहवेह और उनके सामर्थ्य की खोज करो; उनकी उपस्थिति के सतत खोजी बने रहो.

[5] उनके द्वारा किए अद्भुत कार्य स्मरण रखो तथा उनके द्वारा हुए अद्भुत बातें एवं निर्णय भी,

[6] उनके सेवक अब्राहाम के वंश, उनके द्वारा चुने हुए याकोब की संतान.

[7] वह याहवेह हैं, हमारे परमेश्वर; समस्त पृथ्वी पर उनके द्वारा किया गया न्याय स्पष्ट है.

[8] उन्हें अपनी वाचा सदैव स्मरण रहती है, वह आदेश जो उन्होंने हजार पीढ़ियों को दिया,

[9] वह वाचा, जो उन्होंने अब्राहाम के साथ स्थापित की, प्रतिज्ञा की वह शपथ, जो उन्होंने यित्सहाक से खाई थी,

[10] जिसकी पुष्टि उन्होंने याकोब से अधिनियम स्वरूप की, अर्थात इस्राएल से स्थापित अमर यह वाचा:

[11] “कनान देश तुम्हें मैं प्रदान करूंगा. यह वह भूखण्ड है, जो तुम निज भाग में प्राप्त करोगे.”

[12] जब परमेश्वर की प्रजा की संख्या अल्प ही थी, जब उनकी संख्या अत्यंत अल्प थी, और वे उस देश में परदेशी के रूप में निवास कर रहे थे,

[13] जब वे एक देश से दूसरे देश में भटकते फिर रहे थे, वे एक राज्य में से होकर दूसरे में यात्रा कर रहे थे,

[14] परमेश्वर ने किसी भी राष्ट्र को उन्हें दुःखित न करने दिया; उनकी ओर से स्वयं परमेश्वर उन राजाओं को डांटते रहे:

[15] “मेरे अभिषिक्तों का स्पर्श तक न करना; मेरे नबियों को कोई हानि न पहुंचे!”

[16] तब परमेश्वर ने उस देश में अकाल की स्थिति उत्पन्न कर दी. उन्होंने ही समस्त आहार तृप्ति नष्ट कर दी;

[17] तब परमेश्वर ने एक पुरुष, योसेफ़ को, जिन्हें एक दास-स्वरूप विक्रीत कर दिया गया था, उनको दास बनाकर उस देश में पहलेभेज दिया.

[18] उन्होंने योसेफ़ के पैरों में बेड़ियां डालकर उनके पैरों को घायल कर दिया था, उनकी गर्दन में भी बेड़ियां डाल दी गई थी.

[19] तब योसेफ़ की पूर्वोक्ति सत्य प्रमाणित हुई, उनके विषय में, याहवेह के वक्तव्य ने उन्हें सत्य प्रमाणित कर दिया.

[20] राजा ने उन्हें मुक्त करने के आदेश दिए, प्रजा के शासक ने उन्हें मुक्त कर दिया

[21] उसने उन्हें अपना भवन का प्रधान तथा संपूर्ण संपत्ति का प्रशासक बना दिया,

[22] कि वह उनके प्रधानों को अपनी इच्छापूर्ति के निमित्त आदेश दे सकें और उनके मंत्रियों को सुबुद्धि सिखा सकें.

[23] तब इस्राएल ने मिस्र में पदार्पण किया; तब हाम की धरती पर याकोब एक प्रवासी होकर रहने लगे.

[24] याहवेह ने अपने चुनो को अत्यंत समृद्ध कर दिया; यहां तक कि उन्हें उनके शत्रुओं से अधिक प्रबल बना दिया,

[25] जिनके हृदय में स्वयं परमेश्वर ने अपनी प्रजा के प्रति घृणा उत्पन्न कर दी, वे परमेश्वर के सेवकों के विरुद्ध बुरी युक्ति रचने लगे.

[26] तब परमेश्वर ने अपने चुने हुए सेवक मोशेह को उनके पास भेजा, और अहरोन को भी.

[27] उन्होंने परमेश्वर की ओर से उनके सामने आश्चर्य कार्य प्रदर्शित किए, हाम की धरती पर उन्होंने अद्भुत कार्य प्रदर्शित किए.

[28] उनके आदेश ने सारे देश को अंधकारमय कर दिया; फिर भी उन्होंने परमेश्वर के आदेशों की अवहेलना न की.

[29] परमेश्वर ही के आदेश से देश का समस्त जल रक्त में बदल गया, परिणामस्वरूप समस्त मछलियां मर गई.

[30] उनके समस्त देश में असंख्य मेंढक उत्पन्न हो गए, यहां तक कि उनके न्यायियों के शयनकक्ष में भी पहुंच गए.

[31] परमेश्वर ने आदेश दिया और मक्खियों के समूह देश पर छा गए, इसके साथ ही समस्त देश में मच्छर भी समा गए.

[32] उनके आदेश से वर्षा ने ओलों का रूप ले लिया, समस्त देश में आग्नेय विद्युज्ज्वाला बरसने लगी.

[33] तब परमेश्वर ने उनकी द्राक्षालताओं तथा अंजीर के वृक्षों पर भी आक्रमण किया, और तब उन्होंने उनके देश के वृक्षों का अंत कर दिया.

[34] उनके आदेश से अरबेह टिड्डियों ने आक्रमण कर दिया, ये यालेक टिड्डियां असंख्य थी;

[35] उन्होंने देश की समस्त वनस्पति को निगल लिया, भूमि की समस्त उपज समाप्त हो गई.

[36] तब परमेश्वर ने उनके देश के हर एक पहलौंठे की हत्या किया, उन समस्त पहिलौठों का, जो उनके पौरुष का प्रमाण थे.

[37] परमेश्वर ने स्वर्ण और चांदी के बड़ा धन के साथ इस्राएल को मिस्र देश से बचाया, उसके समस्त कुलों में से कोई भी कुल नहीं लड़खड़ाया.

[38] मिस्र निवासी प्रसन्न ही थे, जब इस्राएली देश छोड़कर जा रहे थे, क्योंकि उन पर इस्राएल का आतंक छा गया था.

[39] उन पर आच्छादन के निमित्त परमेश्वर ने एक मेघ निर्धारित कर दिया था, और रात्रि में प्रकाश के लिए अग्नि भी.

[40] उन्होंने प्रार्थना की और परमेश्वर ने उनके निमित्त आहार के लिए बटेरें भेज दीं; और उन्हें स्वर्गिक आहार से भी तृप्त किया.

[41] उन्होंने चट्टान को ऐसे खोल दिया, कि उसमें से उनके निमित्त जल बहने लगा; यह जल वन में नदी जैसे बहने लगा.

[42] क्योंकि उन्हें अपने सेवक अब्राहाम से की गई अपनी पवित्र प्रतिज्ञा स्मरण की.

[43] आनंद के साथ उनकी प्रजा वहां से बाहर लाई गई, उनके चुने हर्षनाद कर रहे थे;

[44] परमेश्वर ने उनके लिए अनेक राष्ट्रों की भूमि दे दी, वे उस संपत्ति के अधिकारी हो गए जिसके लिए किसी अन्य ने परिश्रम किया था.

[45] कि वे परमेश्वर के अधिनियमों का पालन कर सकें और उनके नियमों को पूरी कर सकें. याहवेह का स्तवन हो.

स्तोत्र — Chapters