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[1] परमेश्वर, प्राचीन काल में हमारे पूर्वजों के समय में आपने जो कुछ किया है, पूर्वजों के द्वारा उसका लेखा हमने अपने कानों से सुना है.

[2] अपने भुजबल से आपने राष्ट्रों को निकाल दिया और उनके स्थान पर हमारे पूर्वजों को बसा दिया; आपने उन लोगों को कुचल दिया और हमारे पूर्वजों को समृद्ध बना दिया.

[3] यह अधिकार उन्होंने अपनी तलवार के बल पर नहीं किया, और न ही यह उनके भुजबल का परिणाम था; यह परिणाम था आपके दायें हाथ, उसके सामर्थ्य तथा आपके मुख के प्रकाश का, क्योंकि वे आपके प्रिय पात्र थे.

[4] मेरे परमेश्वर, आप मेरे राजा हैं, याकोब की विजय का आदेश दीजिए.

[5] आपके द्वारा ही हम अपने शत्रुओं पर प्रबल हो सकेंगे; आप ही की महिमामय नाम से हम अपने शत्रुओं को कुचल डालेंगे.

[6] मुझे अपने धनुष पर भरोसा नहीं है, मेरी तलवार भी मेरी विजय का साधन नहीं है;

[7] हमें अपने शत्रुओं पर विजय आपने ही प्रदान की है, आपने ही हमारे शत्रुओं को लज्जित किया है.

[8] हम निरंतर परमेश्वर में गर्व करते रहे, हम सदा-सर्वदा आपकी महिमा का धन्यवाद करते रहेंगे.

[9] किंतु अब आपने हमें लज्जित होने के लिए शोकित छोड़ दिया है; आप हमारी सेना के साथ भी नहीं चल रहे.

[10] आपके दूर होने के कारण, हमें शत्रुओं को पीठ दिखानी पड़ी. यहां तक कि हमारे विरोधी हमें लूटकर चले गए.

[11] आपने हमें वध के लिए निर्धारित भेड़ों समान छोड़ दिया है. आपने हमें अनेक राष्ट्रों में बिखेर दिया है.

[12] आपने अपनी प्रजा को मिट्टी के मोल बेच दिया, और ऊपर से आपने इसमें लाभ मिलने की भी बात नहीं की.

[13] अपने पड़ोसियों के लिए अब हम निंदनीय हो गए हैं, सबके सामने घृणित एवं उपहास पात्र.

[14] राष्ट्रों में हम उपमा होकर रह गए हैं; हमारे नाम पर वे सिर हिलाने लगते हैं.

[15] सारे दिन मेरा अपमान मेरे सामने झूलता रहता है, तथा मेरी लज्जा ने मुझे भयभीत कर रखा है.

[16] उस शत्रु की वाणी, जो मेरी निंदा एवं कलंकित करता है, उसकी उपस्थिति के कारण जो शत्रु तथा बदला लेनेवाले है.

[17] हमने न तो आपको भुला दिया था, और न हमने आपकी वाचा ही भंग की; फिर भी हमें यह सब सहना पड़ा.

[18] हमारे हृदय आप से बहके नहीं; हमारे कदम आपके मार्ग से भटके नहीं.

[19] फिर भी आपने हमें उजाड़ कर गीदड़ों का बसेरा बना दिया; और हमें गहन अंधकार में छिपा दिया.

[20] यदि हम अपने परमेश्वर को भूल ही जाते अथवा हमने अन्य देवताओं की ओर हाथ बढ़ाया होता,

[21] क्या परमेश्वर को इसका पता न चल गया होता, उन्हें तो हृदय के सभी रहस्यों का ज्ञान होता है?

[22] फिर भी आपके निमित्त हम दिन भर मृत्यु का सामना करते रहते हैं; हमारी स्थिति वध के लिए निर्धारित भेड़ों के समान है.

[23] जागिए, प्रभु! सो क्यों रहे हैं? उठ जाइए! हमें सदा के लिए शोकित न छोड़िए.

[24] आपने हमसे अपना मुख क्यों छिपा लिया है हमारी दुर्दशा और उत्पीड़न को अनदेखा न कीजिए?

[25] हमारे प्राण धूल में मिल ही चुके हैं; हमारा पेट भूमि से जा लगा है.

[26] उठकर हमारी सहायता कीजिए; अपने करुणा-प्रेम के निमित्त हमारा उद्धार कीजिए.

स्तोत्र — Chapters