[1] दुष्ट के हृदय में उसका दोष भाव उसे कहते रहता है: उसकी दृष्टि में परमेश्वर के प्रति कोई भय है ही नहीं.
[2] अपनी ही नज़रों में वह खुद की चापलूसी करता है. ऐसा कि उसे न तो अपना पाप दिखाई देता है, न ही उसे पाप से घृणा होती है.
[3] उसका बोलना छलपूर्ण एवं बुराई की है; बुद्धि ने उसका साथ छोड़ दिया है तथा उपकार भाव अब उसमें रहा ही नहीं.
[4] यहां तक कि बिछौने पर लेटे हुए वह बुराई युक्ति रचता रहता है; उसने स्वयं को अधर्म के लिए समर्पित कर दिया है वह बुराई को अस्वीकार नहीं कर पाता.
[5] याहवेह, आपकी करुणा-प्रेम स्वर्ग तक, तथा आपकी विश्वासयोग्यता आकाशमंडल तक व्याप्त है.
[6] आपकी धार्मिकता विशाल पर्वत-समानता, तथा आपकी सच्चाई अजानकारी महासागर तुल्य है. याहवेह, आप ही मनुष्य एवं पशु, दोनों के परिरक्षक हैं.
[7] कैसा अप्रतिम है आपका करुणा-प्रेम! आपके पंखों की छाया में साधारण और विशिष्ट, सभी मनुष्य आश्रय लेते हैं.
[8] वे आपके आवास के उत्कृष्ट भोजन से तृप्त होते हैं; आप सुख के नदी से उनकी प्यास बुझाते हैं.
[9] आप ही जीवन के स्रोत हैं; आपके प्रकाश के द्वारा ही हमें ज्योति का भास होता है.
[10] जिनमें आपके प्रति श्रद्धा है, उन पर आप अपना करुणा-प्रेम एवं जिनमें आपके प्रति सच्चाई है, उन पर अपनी धार्मिकता बनाए रखें.
[11] मुझे अहंकारी का पैर कुचल न पाए, और न दुष्ट का हाथ मुझे बाहर धकेल सके.
[12] कुकर्मियों का अंत हो चुका है, वे ज़मीन दोस्त हो चुके हैं, वे ऐसे फेंक दिए गए हैं, कि अब वे उठ नहीं पा रहे!