[1] का बुद्धि ह नइं पुकारय? का समझ ह ऊंचहा अवाज म नइं बोलय?
[2] ओह डहार के तीर, ऊंचहा ठऊर म, सड़क के चऊक म खड़े होथे;
[3] सहर जाय के रसता, दुवार के बाजू म, प्रवेस दुवार करा, ओह चिचियाके कहिथे:
[4] “हे मनखेमन, मेंह तुमन ला पुकारत हंव; मोर बात ह जम्मो मनखेमन बर अय।
[5] तुमन, जऊन मन भोला-भाला अव, बुद्धिमान बनव; जऊन मन मुरूख अव, ओमन समझदार बनव।
[6] सुनव, मोर करा कहे बर उत्तम बात हवय; मेंह सही बात ला कहिथंव।
[7] मोर मुहूं ले सच बात निकलथे, काबरकि दुस्टता के बात ले मेंह घिन करथंव।
[8] मोर मुहूं के जम्मो बात धरमीपन के होथे; ओमा कोनो उल्टा या खराप बात नइं रहय।
[9] समझनेवाला बर येमन सही अंय; अऊ जऊन मन गियान पा गे हवंय, ओमन बर येमन सीधा अंय।
[10] चांदी के बदले मोर सिकछा ला चुनव, अऊ सुध सोन के बदले मोर गियान ला लव,
[11] काबरकि बुद्धि ह मनि ले जादा कीमती अय, अऊ कोनो भी मनभावन चीज के तुलना येकर ले नइं करे जा सकय।
[12] “में बुद्धि अंव अऊ समझदारी के संग रहिथंव; गियान अऊ बिबेक मोर म हवय।
[13] यहोवा के भय मनई के मतलब बुरई ले घिन करई अय। मेंह घमंड अऊ जिद्दीपन, खराप बरताव अऊ बुरई के बात ले घिन करथंव।
[14] उत्तम सलाह अऊ सही नियाय मेंह करथंव; मोर करा समझ के बात अऊ सामर्थ हवय।
[15] मोर दुवारा राजामन राज करथें अऊ सासन करइयामन सही फैसला करथें।
[16] मोर दुवारा ही सासन करइया, अऊ जम्मो हाकिममन सासन करथें।
[17] मेंह ओमन ला मया करथंव, जऊन मन मोला मया करथें, अऊ जऊन मन मोला खोजथें, ओमन मोला पाथें।
[18] धन अऊ आदरमान मोर करा हवय, ठहरइया धन अऊ उन्नति घलो मोर करा हवय।
[19] मोर फर ह चोखा सोन ले घलो जादा बने अय, अऊ जऊन चीज मेंह उतपन करथंव, ओह उत्तम चांदी ले बढ़के होथे।
[20] मेंह धरमीपन, अऊ नियाय के रसता म चलथंव,
[21] ताकि जऊन मन मोर ले मया करथें, ओमन ला उत्तम उत्तराधिकार दंव, अऊ ओमन के भंडार ला भर दंव।
[22] “यहोवा ह अपन काम के सुरूआत ले, अपन पुराना काम के पहिले मोला लानिस;
[23] मेंह आदिकाल ले, सिरिस्टी ला रचे के पहिले ठहिराय गे हवंव।
[24] जब न तो गहिरा समुंदर रिहिस, अऊ न ही उमड़त पानी के झरना रिहिस, तब ले मेंह जनमे हवंव।
[25] पहाड़ अऊ पहाड़ीमन ला बनाय के पहिले, मेंह जनमेंव;
[26] येकर पहिले कि परमेसर ह संसार या येकर इलाका, या धरती के धुर्रा ला बनातिस।
[27] जब ओह अकासमन ला स्थापित करिस, त मेंह उहां रहेंव, जब ओह समुंदर अऊ अकास के बीच म सीमना बांधिस,
[28] जब ओह ऊपर म बादर ला ठहिराईस अऊ गहरई म पानी के सोत बनाईस,
[29] जब ओह समुंदर के सीमना ला ठहिराईस, ताकि पानी ह ओकर हुकूम ला झन टारय, अऊ जब ओह धरती के नीव रखिस।
[30] तब मेंह हमेसा ओकर संग रहेंव। मेंह हर दिन खुसी म मगन रहेंव, अऊ हमेसा ओकर आघू म आनंदित रहेंव।
[31] मेंह ओकर बसाय जम्मो संसार ले आनंदित रहेंव अऊ मनखेमन म रहिके खुस होवत रहेंव।
[32] “एकरसेति, अब हे मोर लइकामन, मोर बात ला सुनव; धइन अंय ओमन, जऊन मन मोर बताय रसता म चलथें।
[33] मोर सिकछा ला सुनव अऊ बुद्धिमान बनव; येला तुछ झन जानव।
[34] धइन अंय ओमन, जऊन मन मोर गोठ ला सुनथें, अऊ मोर कपाट करा हर दिन रखवारी करथें, अऊ मोर कपाट के रसता म अगोरत रहिथें।
[35] काबरकि जऊन मन मोला पाथें, ओमन जिनगी पाथें अऊ यहोवा ओमन ऊपर किरपा करथे।
[36] पर जऊन मन मोला पाय म असफल होथें, ओमन अपन के हानि करथें; ओ जम्मो जऊन मन मोर ले घिन करथें, ओमन मिरतू ले मया करथें।”