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[1] जऊन गरीब के चालचलन ह सही रहिथे ओह ओ मुरूख ले बने अय, जऊन ह उल्टा-सीधा बात कहिथे।

[2] बिगर गियान के ईछा करई ह बने नो हय— जऊन ह उतावली करथे, ओह रसता ले भटक जाथे।

[3] मनखे ला ओकर मुरूखता ह बिनास कोति ले जाथे, तभो ले ओकर मन ह यहोवा ऊपर गुस्सा करथे।

[4] धनी मनखे के बहुंत संगी बन जाथें, पर गरीब मनखे के खास संगी घलो ओला छोंड़ देथे।

[5] लबरा गवाह ह दंड पाही, अऊ जऊन ह लबारी ऊपर लबारी मारथे, ओह बच नइं सकय।

[6] नाना किसम के भोजन ले सासन करइया ह खुस होथे, अऊ जऊन ह उपहार देथे, ओकर हर मनखे ह संगी बन जाथे।

[7] गरीब मनखे ला ओकर जम्मो रिस्तेदार नापसंद करथें, अऊ ओकर संगीमन घलो ओला छोंड़ देथें। हालाकि गरीब ह बिनती करत ओमन के पीछा करथे, पर ओमन कहीं नइं मिलंय।

[8] जऊन ह बुद्धि पाथे, ओह जिनगी ले मया करथे; जऊन ह समझ के बात करथे, ओह जल्दी बढ़थे।

[9] लबरा गवाह ह दंड पाही, अऊ जऊन ह लबारी ऊपर लबारी मारथे, ओह नास होही।

[10] मुरूख मनखे ला सुबिधा के जिनगी जीना नइं फबे— वइसे ही एक गुलाम के हाकिममन ऊपर राज करई ह अऊ भी नइं फबे।

[11] मनखे के बुद्धि ले धीरज आथे; अऊ दूसर के गलती ला धियान नइं देवई ओकर सोभा होथे।

[12] राजा के गुस्सा ह सिंह के गरजन सहीं होथे, पर ओकर किरपा ह कांदी ऊपर ओस के सहीं होथे।

[13] मुरूख लइका ह अपन ददा के बिनास के कारन होथे, अऊ झगरा करइया घरवाली ह लगातार छानी ले चूहत पानी सहीं अय।

[14] घर अऊ संपत्ति दाई-ददा ले उत्तराधिकार म मिलथे, पर एक बुद्धिमान घरवाली यहोवा करा ले मिलथे।

[15] आलसीपन ले भारी नींद आथे, अऊ साधनहीन मनखे ह भूखा रहिथे।

[16] जऊन ह हुकूम ला मानथे, ओह अपन जिनगी ला बचाथे, पर जऊन ह अपन चालचलन के अपमान करथे, ओह मरही।

[17] जऊन ह गरीब ऊपर दया करथे, ओह यहोवा ला उधार देथे, अऊ यहोवा ह ओला ओकर काम के ईनाम दीही।

[18] अपन लइकामन के ताड़ना कर, काबरकि येमा आसा हवय; अपन मन म ओमन ला मार डारे के निरनय झन कर।

[19] जऊन ह बहुंत गुस्सावाला ए, ओह जरूर दंड पावय; काबरकि यदि तेंह ओला बचाथस, त ओला फेर बचाना पड़ही।

[20] सलाह ला मान अऊ ताड़ना ला गरहन कर, अऊ आखिरी म तोर गनती बुद्धिमानमन के संग होही।

[21] मनखे ह अपन मन म बहुंत योजना बनाथे, पर येह सिरिप यहोवा के ही उदेस्य अय, जऊन ह पूरा होथे।

[22] मनखे ह जेकर ईछा करथे, ओह अटूट मया ए; गरीब मनखे ह एक लबरा मनखे ले जादा बने अय।

[23] यहोवा के भय मनई ह जिनगी के तरफ ले जाथे; तब ओकर भय माननेवाला सुखी रहिथे अऊ ओकर ऊपर समस्या नइं आवय।

[24] आलसी मनखे ह अपन हांथ जेवन के थाली म तो डालथे; पर ओह हांथ के कऊंरा ला मुहूं तक नइं लानय।

[25] ठट्ठा करइया ला कोर्रा म मार, अऊ सीधा मनखे ह समझदारी के बात सीखही; समझदार मनखे ला डांट, अऊ ओह गियान पाही।

[26] जऊन ह अपन ददा ला लूटथे अऊ अपन दाई ला निकाल देथे, ओह ओ लइका अय, जऊन ह लज्जा अऊ कलंक लानथे।

[27] हे मोर बेटा, यदि तें सिकछा के बात सुने बर बंद कर देबे, त तेंह गियान के बात ले भटक जाबे।

[28] भ्रस्ट गवाह ह नियाय ला ठट्ठा म उड़ाथे, अऊ दुस्ट के मुहूं ह बुरई के समरथन करथे।

[29] ठट्ठा करइयामन ला दंड मिलथे, अऊ मुरूखमन के पीठ म मार पड़थे।

नीतिबचन — Chapters