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[1] जऊन ह बार-बार डांटे ले घलो हठी बने रहिथे ओह बिगर कोनो उपाय के अचानक नास हो जाही।

[2] जब धरमीमन उन्नति करथें, त मनखेमन आनंदित होथें; जब दुस्टमन राज करथें, त मनखेमन कलहरथें।

[3] जऊन मनखे ह बुद्धि ले मया करथे, ओह अपन ददा ला आनंदित करथे, पर बेस्यामन के संगति करइया ह अपन संपत्ति ला उड़ा देथे।

[4] नियाय के दुवारा राजा ह देस ला इस्थिर करथे, पर जऊन मन घूसखोरी करते रहिथें, ओमन देस ला टोर देथें।

[5] जऊन मन अपन परोसीमन के चापलूसी करथें ओमन अपन परोसी के गोड़ बर फांदा लगाथें।

[6] दुस्ट मनखेमन अपन खुद के पाप म फंसथें, पर धरमी मनखेमन आनंद के जय-जयकार करके खुसी मनाथें।

[7] धरमी मनखे ह गरीब मनखे के नियाय ऊपर धियान देथे, पर दुस्ट मनखे ह ये किसम के चिंता नइं करय।

[8] ठट्ठा करइयामन सहर ला उत्तेजित करथें, पर बुद्धिमान मनखेमन गुस्सा ला दूर करथें।

[9] यदि कोनो बुद्धिमान मनखे ह कोनो मुरूख मनखे के संग अदालत जाथे, त मुरूख मनखे ह गुस्सा करथे अऊ मजाक उड़ाथे, अऊ उहां सांति नइं रहय।

[10] खून करइया मनखेमन ईमानदार मनखे ले घिन करथें अऊ ओमन सीधवा मनखे के परान के खोज म रहिथें।

[11] मुरूख मनखेमन अपन गुस्सा ला पूरा परगट करथें, पर बुद्धिमान मनखेमन आखिरी म सांति लाथें।

[12] यदि कोनो सासन करइया ह लबारी बात ऊपर कान लगाथे, त ओकर जम्मो करमचारीमन दुस्ट हो जाथें।

[13] गरीब अऊ अतियाचारी मनखे म एक बात समान्य हवय: यहोवा ह दूनों के आंखी म रोसनी देथे।

[14] यदि कोनो राजा ह गरीब के सही नियाय करथे, त ओकर सिंघासन ह सदा बने रहिही।

[15] छड़ी अऊ डांट खाय ले बुद्धि मिलथे, पर जऊन लइका ला अनुसासित नइं करे जावय, ओह अपन दाई के बेजत्ती के कारन होथे।

[16] जब दुस्टमन बढ़थें, त पाप ह घलो बढ़थे, पर धरमीमन ओमन के गिरे दसा ला देखहीं।

[17] अपन लइकामन ला अनुसासित करव, अऊ ओमन तुमन ला सांति दीहीं; ओमन तुम्हर ईछा मुताबिक तुमन ला खुसी दीहीं।

[18] जिहां अगम के बारे म दरसन के बात नइं होवय, उहां मनखेमन निरंकुस हो जाथें; पर धइन ए ओ, जऊन ह बुद्धि के बात ऊपर धियान देथे।

[19] सेवकमन ला सिरिप बात के दुवारा सुधारे नइं जा सकय; हालाकि ओमन समझथें, पर ओमन जबाब नइं देवंय।

[20] का तेंह अइसने मनखे ला देखथस, जऊन ह उतावली म गोठियाथे? ओकर ले जादा कोनो मुरूख ले आसा करे जा सकथे।

[21] जऊन सेवक ला ओकर लइकापन ले बहुंत खवाय-पीयाय जाथे, ओह आखिरी म ढीठ हो जाथे।

[22] गुस्सा करइया मनखे ह झगरा ला बढ़ाथे, अऊ तुरते गुस्सा होवइया मनखे ह बहुंत पाप करथे।

[23] घमंड ह मनखे ला नीचा देखाथे, पर नम्र आतमावाला ह आदर पाथे।

[24] चोरमन के सहभागीमन अपन खुद के बईरी होथें; ओमन किरिया खाके घलो गवाही नइं देवंय।

[25] मनखे के भय ह एक फांदा साबित होथे, पर जऊन ह यहोवा ऊपर भरोसा रखथे, ओह सुरकछित रहिथे।

[26] बहुंत जन सासन करइया ले भेंट करे बर चाहथें, पर मनखे ला नियाय यहोवा ले ही मिलथे।

[27] धरमी मनखे ह बेईमान मनखे ले घिन करथे; अऊ दुस्ट मनखे ह ईमानदार मनखे ले घिन करथे।

नीतिबचन — Chapters