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[1] हे मोर बेटामन, अपन ददा के सिकछा ला सुनव, अऊ समझ के बात ला जाने बर मन लगावव।

[2] मेंह तुमन ला उत्तम सिकछा देथंव, एकरसेति मोर सिकछा ला झन छोंड़व।

[3] जब मेंह घलो अपन ददा के बेटा रहेंव, सुकुमार, अऊ अपन दाई के दुलारा रहेंव;

[4] त मोर ददा ह ये कहिके मोला सिखावय, “तोर पूरा मन मोर बचन म लगे रहय; मोर हुकूममन ला मान अऊ जीयत रह।

[5] तोला बुद्धि मिलय अऊ समझ घलो मिलय; मोर बातमन ला झन भुलाबे या ओमन ला झन छोंड़बे।

[6] बुद्धि ला झन छोंड़बे, अऊ ओह तोर रकछा करही; ओकर ले मया कर, अऊ ओह तोर रखवारी करही।

[7] बुद्धि ह सबले उत्तम ए, एकरसेति येला पाय के कोसिस कर, अऊ समझ ला पाय बर जम्मो कुछू कर।

[8] ओकर बात मान, त ओह तोला ऊपर उठाही; ओला धरे रह, अऊ ओह तोर आदर करही।

[9] ओह तोर मुड़ ला सोभा देवइया एक माला पहिराही अऊ तोला सुघर मुकुट दीही।”

[10] हे मोर बेटा, मोर बात ला सुन अऊ ओला मान, तब तेंह बहुंत बछर जीयबे।

[11] मेंह तोला बुद्धि के रसता बतात हंव, अऊ सीधई के डहार म ले जावत हंव।

[12] जब तेंह रेंगबे, त कोनो बाधा नइं होही, अऊ जब तेंह दऊड़बे, त तोला ठोकर नइं लगही।

[13] सिकछा ला मान, ओला झन छोंड़; येकर रखवारी कर, काबरकि येह तोर जिनगी अय।

[14] दुस्टमन के डहार म झन जाबे, अऊ न ही खराप मनखेमन के रसता म चलबे।

[15] ओ रसता ले अलग रह, ओमा झन जा; ओमा ले हटके अपन रसता म जा।

[16] काबरकि दुस्ट मनखेमन जब तक बुरई नइं कर लीहीं, तब तक ओमन ला चैन नइं मिलय; जब तक ओमन काकरो ठोकर खाय के कारन नइं बनंय, तब तक ओमन ला नींद नइं आवय।

[17] ओमन दुस्टता ले कमाय रोटी ला खाथें अऊ लड़ई-झगरा करके लाने अंगूर के मंद ला पीथें।

[18] धरमीमन के चाल ह बिहनियां निकलत सूरज सहीं अय, जेकर अंजोर ह मंझन होवत तक बढ़त ही रहिथे।

[19] पर दुस्टमन के रसता ह भयंकर अंधियार सहीं अय; ओमन नइं जानंय कि ओमन का चीज ले ठोकर खाथें।

[20] हे मोर बेटा, जऊन बात मेंह कहत हंव, ओकर ऊपर धियान दे, अऊ मोर बात ला सुन।

[21] ये बातमन ला हर समय सुरता रख; येमन ला अपन हिरदय म रख।

[22] काबरकि जऊन मन येमन ला पाथें, ओमन ला येमन जिनगी, अऊ ओमन के जम्मो सरीर ला चंगई देथें।

[23] सबले जादा अपन मन के रखवारी कर, काबरकि तोर हर काम तोर मन ले ही निकलके आथे।

[24] बेईमानी के बात तोर मुहूं ले झन निकलय, अऊ चालबाजी के बात ले दूरिहा रह।

[25] तेंह सीधा आघू ला देख, अऊ अपन सामने के बात म सीधा धियान लगा।

[26] अपन पांव धरे बर डहार ला समतल कर, अऊ अपन जम्मो रसता म अटल बने रह।

[27] न तो जेवनी, अऊ न ही डेरी अंग मुड़, अऊ न ही बुरई के रसता म रेंग।

नीतिबचन — Chapters