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[1] इसलिए जो लोग मसीह यीशु में हैं, उन पर दण्ड की आज्ञा नहीं है

[2] क्योंकि मसीह यीशु में जो जीवन है उस जीवन की आत्मा के नियम ने मुझे (यहूदियों को) पाप और मौत के क्रम (मूसा के नियम - अज्ञाओं) से आज़ाद कर दिया है।

[3] परमेश्‍वर द्वारा दी गयी आज्ञाएँ और नियम पुराने स्वभाव के कारण, अपने में बलहीन थे, उसे परमेश्‍वर ने अपने बेटे को पापमय करके बलिदान चढ़ा दिया। और परमेश्‍वर ने अपराध को पापमय स्वभाव में दोषी ठहराया,

[4] ताकि नियमों और आज्ञाओं की उचित माँग हम में जो शरीर (पुराने स्वभाव की प्रेरणा) के अनुसार नहीं परन्तु आत्मा के अनुसार चलते हैं, पूरी की जाए।

[5] जो लोग बुरे स्वभाव के आधार पर जीवन जीते हैं, वे अपनी लालसाओं पर अपने मन को लगाते हैं, किन्तु जो परमेश्‍वर के आत्मा के द्वारा चलते हैं, वे परमेश्‍वर के आत्मा की इच्छाओं पर ध्यान लगाते हैं।

[6] शरीर के वश में होकर चलने से मौत मिलती है, लेकिन जो मन परमेश्‍वरीय आत्मा द्वारा अनुशासित किया जाता है वहाँ जीवन और शान्ति है।

[7] क्योंकि शरीर (बुरे या पुराने स्वभाव) पर मन लगाना तो परमेश्‍वर से दुश्मनी रखना है। यह परमेश्‍वरीय विधान के प्रति आधीनता न स्वीकार करता है, न कर सकता है।

[8] जो लोग बुरे स्वभाव के शिकंजे (शारीरिक दशा) में हैं, वे परमेश्‍वर को खुश नहीं कर सकते।

[9] यदि परमेश्‍वरीय आत्मा तुम्हारे अन्दर रहता है तो तुम बुरे स्वभाव की गुलामी में नहीं हो, लेकिन आत्मिक दशा में हो। और यदि ऐसा है तो परमेश्‍वर का आत्मा तुम में वास करता है, यदि किसी में मसीह का आत्मा नहीं है, तो वह मसीह का जन नहीं है।

[10] यदि मसीह तुम में हैं, तो हालाँकि पाप के कारण तुम्हारी देह मरी हुयी है, फिर भी धार्मिकता के कारण तुम्हारी आत्मा जीवित है।

[11] परन्तु यदि परमेश्‍वर का आत्मा जिन्होंने मसीह को मरे हुओं में से जिलाया, तुम्हारे भीतर है, तो जिन्होंने मसीह को मरे हुओं में से जिलाया, उस आत्मा के द्वारा जो तुम्हारे भीतर है, तुम्हारी मरणशील देह को भी जिलायेंगे।

[12] इसलिए भाइयो-बहनो, हम बुरी इच्छा या बुरे स्वभाव (शरीर) के कर्ज़दार नहीं, कि हम उसकी बात मान कर चलें।

[13] क्योंकि यदि तुम उस पुराने स्वभाव के अनुसार जीओगे तो मरोगे, किन्तु यदि पवित्र आत्मा के द्वारा देह के गंदे कामों को मारोगे, तो जीवित रहोगे।

[14] इसलिए कि जो लोग परमेश्‍वर की आत्मा के द्वारा जीवन बिताते हैं, वे ही उनके बेटे-बेटियाँ हैं।

[15] इसलिए कि तुम ने ऐसा आत्मा नहीं पाया है, जो तुम्हें डर का गुलाम बनाता है, लेकिन तुम ने लेपालकपन का आत्मा पाया है, इसलिए हम उन्हें पिता कहकर पुकारते हैं।

[16] परमेश्‍वर का आत्मा हमारी खुद की आत्मा के साथ गवाही देता है, कि हम परमेश्‍वर के बेटे बेटियाँ (सन्तान) हैं।

[17] यदि हम उनकी औलाद (बेटे-बेटियाँ) हैं, तो हम वारिस हैं अर्थात् मसीह के साथ वारिस और परमेश्‍वर पिता के वारिस। यदि ऐसा है तो, हम मसीह के दुःखों में भागी होते हैं और तभी हम उनके सम्मान और आदर में भी शामिल हो सकेंगे।

[18] मुझे लगता है, कि हमारा इन दिनों का दुःख उस सम्मान के सामने जो हम पर प्रगट किया जाएगा, तुलना करने लायक नहीं है।

[19] सृष्टि बड़ी उत्सुकता से परमेश्‍वर के पुत्रों (संतान के) प्रगट होने का इंतज़ार कर रही है।

[20] क्योंकि सृष्टि अपनी इच्छा से बर्बादी के लिए आधीन नहीं की गयी थी, बल्कि उनकी इच्छा से जिन्होंने इसे आधीन कर दिया था।

[21] वह भी इस आशा से कि सृष्टि गुलामी और सड़ाहट से छुड़ायी जाकर परमेश्‍वर की सन्तान की अद्भुत आज़ादी में लायी जाए।

[22] हम जानते हैं कि अब तक पूरी सृष्टि मानो प्रसव की सी पीड़ा के समान कराह रही है।

[23] मात्र सृष्टि ही नहीं, हम स्वयं जिनके पास पवित्र आत्मा का पहला फल है, हम भी अपने में कराह रहे हैं और गोद लिये जाने (हमारी देह के छुटकारे) का इन्तज़ार कर रहे हैं।

[24] इसी आशा के लिए हम ने मुक्‍ति भी पायी है। परन्तु यदि अपेक्षित वस्तु दिखने लग जाए तो वह आशा नहीं, क्योंकि जिसे व्यक्‍ति देखता है उसकी आशा क्यों करता रहेगा?

[25] लेकिन यदि हम देखने वाली बात के लिए आशा रखते हैं, तो हम उसके लिए धीरज से आशा रखते हैं।

[26] इसी प्रकार से पवित्र आत्मा हमारी कमज़ोरियों में सहायता करता है, क्योंकि हम नहीं जानते कि हमें क्या और कैसे माँगना चाहिए। किन्तु परमेश्‍वर का आत्मा स्वयं हमारे लिए ऐसी आहें भरकर प्रार्थना करता है, जिसे शब्दों में नहीं कहा जा सकता।

[27] जो दिलों को परखते हैं, जानते हैं कि पवित्र आत्मा क्या चाहता है, क्योंकि वह अलग किए हुए लोगों के लिए परमेश्‍वर की इच्छा के अनुसार प्रार्थना करता है।

[28] हम जानते हैं कि जिन्हें परमेश्‍वर के उद्देश्य को पूरा करने के लिए बुलाया गया है, और जो उन से प्यार करते हैं, उनके लिए सब कुछ भले के लिए होता है।

[29] इसलिए कि जिनको परमेश्‍वर ने पहले से जान लिया था, उनके बारे में यह इरादा भी कर लिया कि वे, उनके बेटे यीशु की तरह हों ताकि यीशु तमाम संगी विश्‍वासियों में सर्वश्रेष्ठ (पहिलौठा) ठहरें।

[30] इसके साथ ही जिन्हें पहले से ठहराया उन्हें बुलाया भी और जिन्हें बुलाया, उन्हें निर्दोष (सिद्ध) घोषित किया और जिन्हें धर्मी घोषित किया उन्हें, आदर और सम्मान भी दिया।

[31] इन बातों के सम्बन्ध में हम क्या कहें? यदि परमेश्‍वर हमारे संग हैं, तो हमारा दुश्मन कौन है?

[32] जिन्होंने अपने बेटे तक को बचाकर नहीं रखा, लेकिन उन्हें हम सभी के लिए दे दिया, वह यीशु के साथ हमें मुफ़्त में सब कुछ क्यों नहीं देंगे?

[33] परमेश्‍वर के चुने हुए लोगों के विरोध में कौन आरोप साबित करेगा? परमेश्‍वर स्वयं उन लोगों को दोष मुक्‍त और सिद्ध साबित कर चुके हैं।

[34] कौन उन्हें दोषी ठहराएगा? मसीह ही हैं जो मर गए थे और इस से बढ़कर यह कि वह जिलाए गए और अभी सर्वोच्च अधिकार के साथ परमेश्‍वर के साथ हैं, और वह हमारे लिए मध्यस्थ हैं।

[35] मसीह के प्यार से हमें कौन अलग करेगा? क्या क्लेश, सताव, अकाल, कपड़ों की कमी, समस्या या हिंसा,

[36] जैसा कि लिखा है, "तुम्हारे कारण हम पूरे दिन मारे जाते हैं, हमें काटी जाने वाली भेड़ें समझा जाता है।"

[37] नहीं, इन सभी में जिस प्रभु ने हमसे प्रेम किया, उन में हम जयवन्त (जीत पाए हुए लोगों) से भी बढ़कर हैं।

[38] इसलिए मुझे यह निश्चय है कि न मौत, न जीवन, न स्वर्गदूत, न शासक, न शक्‍तियाँ, न वर्तमान और न आने वाले समय की बातें,

[39] न ऊँचाई, न गहराई, न और कोई भी सृजी वस्तु हमें परमेश्‍वर के उस प्यार से अलग कर सकती है, जो हमारे प्रभु यीशु मसीह में हैं।

रोमियों — Chapters