[1] भाइयो-बहनो, इस्राएल के लिए मेरी लालसा और प्रार्थना यह है कि वे बच जाएँ।
[2] मैं उनके विषय कह सकता हूँ कि उनके मन में परमेश्वर पिता के लिए जोश है, किन्तु यह सच्चाई पर नहीं टिका हुआ है।
[3] क्योंकि वे परमेश्वर द्वारा दी गयी धार्मिकता के बारे में अनजान हैं तथा अपने आप को धर्मी साबित करने की स्वयं कोशिश करते हैं, इसलिए उन्हों ने परमेश्वर से मिली सिद्धता (धार्मिकता) के प्रति समर्पण करने से इन्कार कर दिया है।
[4] इसलिए कि जो कोई विश्वास करता है उसके लिए मसीह, नियमों-आज्ञाओं का अन्त हैं।
[5] नियमशास्त्र के हिसाब से जो धार्मिकता है, उसका वर्णन मूसा इस तरह से करता हैः "जो व्यक्ति उन बातों का पालन करता है, वह उनके द्वारा जीवित रहेगा"।
[6] जो धार्मिकता (निर्दोष ठहराया जाना) विश्वास पर आधारित है इस तरह से बात करती हैः "अपने दिलों में न कहो, कौन स्वर्ग में जाएगा? (मसीह को ऊपर से नीचे लाने के लिए)" या
[7] "अधोलोक में कौन उतरेगा? (मसीह को जिलाने के लिए)"।
[8] लेकिन यह (नियमशास्त्र) क्या कहता है? यह कि "वचन तुम्हारे पास है, तुम्हारे मुँह और मन में है, (यही वह वचन है जो हम सुनाते हैं)।
[9] विश्वास यह, कि यदि तुम अपने मुँह से यीशु प्रभु (स्वामी) को मान लो और मन में यह विश्वास करो कि परमेश्वर ने उन्हें मरे हुओं में से जिलाया, तो तुम मुक्ति पाओगे।
[10] खरा ठहरने के लिए हृदय (आत्मा) से भरोसा किया जाता है और मुक्ति के लिए मुँह से अंगीकार किया जाता है।
[11] जैसा कि पहले ही से बाइबल में कहा जा चुका हैः "जो कोई उन पर विश्वास करता है वह कभी भी शर्मिन्दा नहीं होगा"। इसलिए कि यहूदी और गैर यहूदियों में कोई अन्तर नहीं है, क्योंकि वही स्वामी उन सभी के ऊपर हैं जो उनको पुकारते हैं।
[12] जो कोई प्रभु का नाम लेगा वह बच जाएगा।
[13] जिन पर उन लोगों ने विश्वास नहीं किया, वे उन्हें क्यों पुकारेंगे?
[14] जिन्होंने विश्वास नहीं किया, वे यीशु पर विश्वास कैसे करेंगे तथा बिना किसी संदेश देने वाले के भेजे जाने से, लोग कैसे संदेश सुनेंगे? जिनके बारे में उन्हों ने सुना नहीं उन पर वे कैसे विश्वास करेंगे? संदेश देने वाले व्यक्ति के बगैर वे सुनेंगे कैसे?
[15] और यदि संदेश देने वाले भेजे न जाएँ तो वे कैसे संदेश देंगे। जैसा कि लिखा है "जो लोग शान्ति का समाचार देते हैं और अच्छी बातों का समाचार लाते हैं, उनके पैर कितने सुन्दर हैं"।
[16] लेकिन सभी लोगों ने खुशी की खबर को स्वीकार नहीं किया। जैसा कि यशायाह कहता है, "प्रभु हमारे सुसमाचार पर किसने भरोसा किया है?"
[17] इसलिए विश्वास सुनने से और सुनना परमेश्वर के वचन से है।
[18] परन्तु मैं पूछता हूँ, कि उन्हों ने क्यों नहीं सुना? हाँ बिल्कुल सुना हैः क्योंकि लिखा है, "प्रभु की वाणी पूरी पृथ्वी पर और उनके शब्द विश्व के अन्त तक पहुँचे हैं।"
[19] किन्तु मैं कहता हूँ क्या इस्राएल को यह मालूम नहीं है? पहले मूसा कहता है, "जो लोग एक देश (जाति) नहीं हैं, उनके द्वारा मैं तुम्हें ईर्ष्यालु बनाऊँगा, एक मूर्ख देश द्वारा मैं तुम्हें क्रोधित करूँगा।" परन्तु यशायाह बहुत साहसी है और कहता है,
[20] "जो मुझे ढूँढ नहीं रहे थे, उन्हों ने भी मुझे पा लिया जिन्होंने मेरे बारे में पूछा तक नहीं, उन पर मैं प्रगट किया गया।"
[21] किन्तु इस्राएल के बारे में वह कहता है, काफ़ी समय तक मैं अपने हाथ, हुकुम (आज्ञा) न मानने वाले और बलवा करने वाले लोगों के सामने फैलाए इंतज़ार करता रहा।