Skip to content
Opens in a new window
Listen to this chapter • 4:49

[1] एक यहूदी होने से क्या लाभ या खतना कराने से क्या फ़ायदा है?

[2] इसके बहुत फ़ायदे हैं, क्योंकि परमेश्‍वर के वचन उन्हें सौंपे गए थे।

[3] अगर कुछ लोगों ने विश्‍वास नहीं किया तो क्या हुआ? क्या उनका अविश्‍वास परमेश्‍वर की सच्चाई को असरहीन बना सकता है?

[4] बिल्कुल नहीं। परमेश्‍वर सच ठहरे और हर एक व्यक्‍ति झूठा। जैसा कि लिखा है, "तुम अपनी कही हुयी बातों में खरे ठहराए जा सको और जब तुम्हारा इंसाफ़ हो, तब जीत पा सको"

[5] अगर हमारी अधार्मिकता (बुरी और गलत जीवन शैली) परमेश्‍वर की विश्‍वासयोग्यता को दिखाती है, तो हम क्या कहें? क्या मनुष्य पर दण्ड लाने के कारण परमेश्‍वर अन्यायी हैं (मैं मनुष्य होने के नाते ऐसा कह रहा हूँ)?

[6] बिल्कुल नहीं, क्योंकि तब परमेश्‍वर लोगों का इंसाफ़ कैसे करेंगे?

[7] इसलिए कि यदि मेरे झूठ बोलने से परमेश्‍वर की सच्चाई उनकी इज़्ज़त बढ़ाती है, तो मैं परमेश्‍वर की दृष्टि में दोषी क्यों ठहरूँ?

[8] इसके बजाए हम यह क्यों न कहें (जैसा कि हम पर यह आरोप लगाया जाता है कि हम ऐसा मानते हैं) - "आओ हम बुराई करें ताकि उससे भलाई उत्पन्न हो"? उन्हें दोषी ठहराया जाना उचित है।

[9] तब क्या कहा जाए? क्या हम उन से अच्छे हैं? नहीं, बिल्कुल नहीं, इसलिए कि हम पहले ही से यह दोष लगा चुके हैं कि दोनों, यहूदी और गैरयहूदी परमेश्‍वर की दृष्टि में अपराधी हैं।

[10] जैसा लिखा है, "कोई भी व्यक्‍ति धर्मी (निर्दोष) और खरा नहीं है, यहाँ तक कि एक भी नहीं,

[11] ऐसा कोई व्यक्‍ति नहीं, जिसको समझ हो या जो परमेश्‍वर के लिए भूखा हो।

[12] वे सभी गुमराह हो चुके हैं वे सब किसी काम के नहीं रहे। ऐसा कोई नहीं, जो कोमलता दिखाता हो, एक भी नहीं।"

[13] "उनका गला खुली कब्र के समान है। वे अपनी जीभ से झूठ बोलते हैं, उनके ओठों के नीचे साँप का ज़हर है।"

[14] "उनका मुँह शाप और कड़वाहट से भरा है।"

[15] "उनके पैर खून बहाने के लिए फुर्तीले हैं।

[16] उनकी राहों में बर्बादी और तकलीफ़ें है।

[17] वे चैन के रास्ते को नहीं जानते हैं।"

[18] "उनकी आँखों में परमेश्‍वर का डर नहीं है।"

[19] अब हम यह जानते हैं कि जो कुछ नियमशास्त्र कहता है, वह उन्हीं से कहता है, जो उसको मानने वाले हैं, ताकि हर एक मुँह को बन्द किया जा सके और सारी दुनिया परमेश्‍वर के सामने ज़िम्मेदार ठहरे।

[20] इसलिए सिर्फ़ नियमशास्त्र के पालन करने से कोई व्यक्‍ति परमेश्‍वर की निगाह में धर्मी (सिद्ध) ठहराया नहीं जाएगा, क्योंकि नियमशास्त्र ही के द्वारा मालूम पड़ता है, क्या बुरा है और क्या नहीं।

[21] लेकिन परमेश्‍वर ने एक रास्ता (तरीका) हमें दिखा दिया है, कि बिना उन नियमों के पालन जिनका वायदा मूसा और नबियों की किताब में है, किस तरह परमेश्‍वर के साथ रिश्ता कायम किया जाए।

[22] परमेश्‍वर से मिलने वाली धार्मिकता (पवित्रता और सिद्धता) जो यीशु मसीह पर विश्‍वास करने से हासिल होती है, सभी विश्‍वास करने वालों के लिए है, चाहे वे कोई भी क्यों न हों।

[23] सभी ने (परमेश्‍वर के खिलाफ) बलवा किया है और परमेश्‍वर के सामने खरे नहीं हैं।

[24] लेकिन जो छुड़ाया जाना मसीह यीशु में उनकी महान कृपा से है उसके द्वारा वे मुफ़्त में सज़ा मुक्त किए गये हैं।

[25] जिस अनुग्रह (दया) के स्थान पर विश्‍वास से पहुँचते हैं वहाँ पर उनकी कुर्बानी (प्रायश्चित) के समय परमेश्‍वर ने उन्हें (यीशु को) सब के सामने रखा।

[26] यह उन्हों ने इसलिए किया, ताकि इस समय उनकी विश्‍वासयोग्यता दिखायी दे, और वह (परमेश्‍वर) यीशु पर विश्‍वास करने वाले को बिना किसी दोष का एलान करें।

[27] फिर घमण्ड करना कहाँ रहा? इसकी तो कोई जगह ही नहीं है, अगर है तो किस सिद्धान्त से? कामों के सिद्धान्त से नहीं? लेकिन विश्‍वास के के ज़रिये।

[28] इस से हम यह निचोड़ निकालते हैं, कि नियमशास्त्र के कामों से अलग विश्‍वास ही से एक व्यक्‍ति धर्मी (निर्दोष) घोषित किया जाता है।

[29] क्या वह केवल यहूदियों के परमेश्‍वर हैं? क्या वह गैरयहूदियों के भी नहीं? हाँ यहूदियों और गैरयहूदियों के भी हैं।

[30] इसलिए जब खतना वाले और खतनाहीन को एक ही परमेश्‍वर विश्‍वास से क्षमा देते हैं।

[31] तब क्या विश्‍वास की अहमियत की वजह से हम नियमशास्त्र को अलविदा कह दें। बिल्कुल नहीं! इसके विपरीत हम नियमशास्त्र को उसका उचित आदर सम्मान देते हैं।

रोमियों — Chapters