[1] सो हम क्या कहें? अब्राहम, जो शरीर के अनुसार हमारा पूर्वज है, विश्वास से मुक्ति के प्रश्न पर क्या अनुभव रखता था?
[2] क्योंकि यदि अब्राहम कर्मों द्वारा सिद्ध ठहराया गया होता, तो उसका घमण्ड करना ठीक था, लेकिन परमेश्वर के सामने नहीं।
[3] इसके बारे में बाइबल में क्या लिखा है? अब्राहम ने परमेश्वर पर विश्वास किया और यह विश्वास करना उसके लिए विश्वासयोग्यता गिना गया।
[4] जो मेहनत करता है, उसकी मज़दूरी ईनाम नहीं है, लेकिन वह उसका हक बनता है।
[5] परन्तु जो मेहनत नहीं करता, (लेकिन परमेश्वर जो दुष्ट को पवित्र ठहराते हैं), उन पर भरोसा करता है, उसका विश्वास उस व्यक्ति के लिए विश्वासयोग्यता (धार्मिकता) गिना जाता है।
[6] जैसा राजा दाऊद भी उस व्यक्ति को आशीषित कहता है, जिसे परमेश्वर द्वारा कामों के आधार पर नहीं लेकिन विश्वास के आधार पर धर्मी ठहराया जाता है।
[7] "आशीषित वे हैं जिनके गुनाह माफ़़ किए गए और जिनकी दुष्टता ढाँक दी गयी।
[8] आशीषित व्यक्ति वह है, जिसे मुजरिम (अपराधी) न ठहराया गया हो।
[9] क्या इस वचन से सिर्फ़ खतना वाले ही आशीष पाते हैं, या बिना खतना वाले भी? क्योंकि हमारा कहना है, कि अब्राहम विश्वास से धर्मी ठहराया गया था।
[10] अब्राहम कब धर्मी ठहराया गया, खतने के पहले या खतने के बाद में? खतने के बाद नहीं, लेकिन इसके पहले।
[11] जब वह खतना रहित था, उसने खतने का निशान पाया, जो विश्वास से अपनाए जाने की मोहर थी। साथ ही यह कि विश्वास के द्वारा अब्राहम उन लोगों का भी पिता हो सके जो खतना रहित दशा में विश्वास करते हैं, ताकि वे भी धर्मी ठहराए जाएँ।
[12] अब्राहम खतना वालों का ही पिता नहीं हैं, लेकिन उनका भी है, जो अब्राहम के विश्वास के पदचिन्हों पर चलते हैं, जिसके पास खतना रहित स्थिति में विश्वास था।
[13] अब्राहम या उसके वंश तक दुनिया को विरासत में पाने की प्रतिज्ञा मूसा के नियमशास्त्र से नहीं पहुँची, लेकिन विश्वास से मिलने वाली धार्मिकता (सिद्धता) से।
[14] इसलिए कि अगर लोग नियमशास्त्र की वजह से वारिस हैं, तो विश्वास बेकार ठहरा और प्रतिज्ञा भी बेअसर हुयी,
[15] क्योंकि नियमशास्त्र के पालन नहीं किये जाने से प्रकोप पैदा होता है, लेकिन जहाँ नियमशास्त्र है ही नहीं उसके तोड़े जाने का सवाल ही नहीं उठता।
[16] इसलिए वायदा विश्वास का नतीजा है और विश्वास पर निर्भर भी है, ताकि अब्राहम के वंश के लिए वायदा निश्चित रूप से काम करे, सिर्फ़ उनके लिए नहीं जो नियमशास्त्र के मानने वाले हैं, लेकिन उनके लिए भी जो अब्राहम का सा विश्वास रखने वाले हैं, जो कि हम सब का पिता है
[17] जैसा कि लिखा है, "मैंने तुम्हें बहुत से राष्ट्रों का पिता बनाया है जिन (परमेश्वर) पर उस (अब्राहम) ने विश्वास किया, उन (परमेश्वर) की मौजूदगी में अब्राहम हमारा पिता है - वह परमेश्वर मरे हुओं को ज़िन्दा करते हैं, जो बातें हैं नहीं उन्हें इस तरह कहते हैं, जैसे कि वास्तव में वे हैं।
[18] कोई आशा न होने पर भी अब्राहम ने भरोसा किया, कि जो कुछ उससे कहा गया था, "कि तुम्हारा वंश ऐसा होगा" या "तुम्हारी सन्तान तारों के समान असंख्य होगी", उसी कथन के अनुसार वह बहुत से देशों का पिता बना।
[19] अब्राहम विश्वास में डगमगाया नहीं था। सौ साल का होने के बावजूद भी उसने न अपनी देह को और न सारा की कोख़ को मरा हुआ समझा।
[20] शक के कारण वह परमेश्वर के वायदों पर लड़खड़ाया नहीं, लेकिन परमेश्वर की बड़ाई करता हुआ विश्वास में मज़बूत बना रहा और परमेश्वर की प्रशंसा की।
[21] वह पूरी तरह से निश्चिन्त था कि जैसा वायदा उसे मिला है, परमेश्वर वैसा करने के योग्य हैं।
[22] इसलिए उसका यह भरोसा उसके नाम पर विश्वासयोग्यता गिना गया।
[23] यह केवल अब्राहम के लिए नहीं लिखा गया था लेकिन हमारे लिये भी लिखा गया था,
[24] कि हम उन परमेश्वर पर विश्वास करें जिन्होंने यीशु मसीह को मरे हुओं में से जिलाया था।
[25] और यह कि हमारे अपराधों के कारण यीशु मारे गए और हमें खरा (सिद्ध) ठहराने के लिए वह जिलाए गए।