[1] इसलिए जब हम विश्वास से धर्मी (दोषमुक्त, क्षमा किए हुए और सिद्ध) ठहराए गए, प्रभु यीशु मसीह के द्वारा परमेश्वर के साथ हमारा रिश्ता सुधर गया है।
[2] विश्वास के द्वारा हमारी पहुँच उस शर्तहीन कृपा (अनुग्रह) तक होती है, जिसमें आज तक हम बने हुए हैं और परमेश्वर की महिमा की आशा में खुश होते हैं।
[3] इतना ही नहीं, हम अपने सताव में भी खुश हों यह जानते हुए कि सताव सहते रहने से धीरज पैदा होता है।
[4] धीरज वाली सहनशीलता से चरित्र बनता है और ग्रहणयोग्य चरित्र से आशा।
[5] आशा किसी भी तरह से निराश नहीं करती है, क्योंकि जो पवित्र आत्मा हमें दिया गया है, उसके द्वारा परमेश्वर पिता का प्यार उन्हों ने हमारे दिलों में डाला है।
[6] जब हम अपनी असहाय अवस्था में थे, तब ही यीशु परमेश्वर-रहित लोगों के लिए मरे।
[7] शायद ही कोई किसी भले व्यक्ति के लिए जान देने के लिए तैयार हो।
[8] किन्तु परमेश्वर हम पर अपने प्रेम को इस तरह दिखाते हैः कि जब हम दोषी ही थे, यीशु मसीह हमारे लिए मर गए।
[9] इस से अधिक यह कि जब उनके खून से हम आरोप मुक्त घोषित किए गये हैं, तो हम यीशु के द्वारा परमेश्वर की सज़ा से क्यों नहीं बचेंगे।
[10] इसलिए कि जब हम परमेश्वर के दुश्मन थे, उनके बेटे की मौत से हमारा उनके साथ मेल हो गया है, तो उनके जीवन के कारण हम उद्धार क्यों नहीं पाएँगे।
[11] इतना ही नहीं हम मसीह यीशु में होकर, परमेश्वर पिता में भी खुश होते हैं, जिनसे हम ने इस रिश्ते को पाया है।
[12] इसलिए, जिस तरह एक इन्सान के द्वारा "पाप" दुनिया में आया और "पाप के द्वारा मौत', इसलिए सभी के पाप करने की वजह से मौत सब लोगों में फैल गयी।
[13] नियमशास्त्र के दिए जाने तक पाप दुनिया में था लेकिन जहाँ नियमशास्त्र नहीं है, वहाँ पाप के होने की बात ही नहीं।
[14] इसके बावजूद मौत ने आदम से लेकर मूसा तक शासन किया। उन लोगों पर भी, जिन्होंने 'आदम की आज्ञा न मानने के समान' अपराध नहीं किया था। आदम दूसरे "आने वाले" का ही एक नमूना है।
[15] लेकिन मुफ़्त ईनाम की तुलना अपराध से नहीं की जा सकती। क्योंकि जिस तरह एक व्यक्ति के अपराध के कारण बहुत से मर गए, उसी तरह एक ही इन्सान (यीशु मसीह) की कृपा द्वारा परमेश्वर की कृपा से ईनाम बहुत लोगों तक है।
[16] इस ईनाम की तुलना पाप के उस परिणाम से नहीं की जा सकती है, जो प्रथम मनुष्य आदम के आज्ञा न मानने से हुआ था। क्योंकि न्याय एक व्यक्ति के द्वारा आया और उससे लोग दोषी ठहरे, लेकिन जो मुफ़्त धार्मिकता (निर्दोषता) तमाम अपराधों के बाद आयी, वह हमारे धर्मी (निरपराध) ठहराए जाने के लिए थी।
[17] इसलिए कि जब एक इन्सान के अपराध के कारण मौत ने राज्य किया तो और कितना अधिक जो लोग कृपा की भरपूरी और धार्मिकता (निर्दोषता) के ईनाम को पाते हैं, जीवन में उस ही यीशु मसीह के द्वारा राज्य करेंगे।
[18] इसलिए जिस तरह से एक व्यक्ति के अपराध के कारण सज़ा सभी लोगों के ऊपर आयी और सभी दोषी ठहरे, उसी तरह से एक मनुष्य के सही कदम से सारी मानवजाति का मुफ़्त ईनाम निर्दोषता है।
[19] इसलिए कि जिस तरह एक व्यक्ति के आज्ञा न मानने से बहुत लोग अपराधी ठहरे, उसी तरह से एक व्यक्ति के आज्ञा मानने से बहुत लोग धर्मी ठहराए जाएँगे।
[20] इसके अलावा नियमशास्त्र इसलिए आया ताकि बुराई का खुलासा हो सके। किन्तु जहाँ पाप का खुलासा हुआ, कृपा और अधिक बढ़ गयी।
[21] ताकि जिस प्रकार से पाप ने मौत में शासन किया, वैसे ही कृपा भी (अनुग्रह, फ़ज़ल) प्रभु यीशु मसीह के द्वारा सदाकाल के जीवन में प्रगट हो (राज्य करे)।