[1] जो विश्वास में नया (शुरूआती विश्वास वाला) है, उसे अपना लो, और मतभेद (शंका) वाले विषयों पर वाद विवाद मत करो।
[2] एक यह मानता है कि सब कुछ खाया जा सकता है। दूसरा व्यक्ति मात्र साग सब्ज़ी खाता है।
[3] इसलिए जो सब कुछ खाता है उसे, उस व्यक्ति को नीचा नहीं समझना चाहिए जो सब कुछ नहीं खाता है; उसे दूसरे व्यक्ति की बुराई नहीं करनी चाहिए जो सब कुछ खाता है, क्योंकि परमेश्वर ने उसे भी स्वीकार किया है।
[4] तुम कौन हो जो परमेश्वर के जन को दोषी ठहराओ? ऐसा व्यक्ति अपने प्रभु के सामने ज़िम्मेदार है। इसलिए कि परमेश्वर पिता उसे स्थिर रखने में सामर्थी हैं।
[5] एक व्यक्ति सोचता है, कि एक दिन दूसरे से बेहतर है, दूसरा व्यक्ति सोचता है कि हर दिन समान हैं। इस विषय में प्रत्येक व्यक्ति अपने मन में पूरा यकीन रखे।
[6] जो किसी दिन को खास समझता है, वह यीशु के लिए ऐसा करता है। जो किसी दिन को खास नहीं समझता, वह प्रभु के लिए ऐसा करता है। जो व्यक्ति सब कुछ खाता है वह यीशु के लिए, परमेश्वर को धन्यवाद देकर खाता है। वैसे ही जो व्यक्ति सब कुछ नहीं खाता है वह भी धन्यवाद के साथ ऐसा करता है।
[7] हम में से कोई भी अपने लिए न जीवित रहता, और न ही मरता है।
[8] इसलिए यदि हम जीवित हैं, तो यीशु के लिए, यदि मरते हैं, तो यीशु के लिए। इसलिए चाहे हम जिएँ या मरें, हम यीशु के हैं
[9] इसी कारणवश यीशु भी मर गए, जी उठे और जीवित हैं, ताकि वह मरे और जीवितों दोनों के स्वामी ठहरें।
[10] तुम अपने भाई को क्यों दोषी ठहराते हो, या उसे नीचा क्यों समझते हो? क्योंकि हम सभी मसीह के न्याय के सिंहासन के सामने खड़े होंगे।
[11] जैसा लिखा है कि, प्रभु का कहना है, "मैं जीवित हूँ हर एक घुटना मेरे सामने झुकेगा और प्रत्येक जीभ परमेश्वर को मान लेगी",
[12] क्योंकि हम में से हर एक अपना-अपना हिसाब परमेश्वर को देगा।
[13] इसलिए आगे से हम किसी दूसरे पर दोष न लगाएँ। हम ध्यान दें, कि कोई व्यक्ति अपने भाई के जीवन में ठोकर का कारण या अड़चन न बने।
[14] मैं जानता हूँ और यीशु मसीह के द्वारा निश्चित हूँ, कि कोई भी खाने की चीज अपने आप में अशुद्ध नहीं है, लेकिन जो व्यक्ति किसी भोजन वस्तु को अशुद्ध समझता है, उसके लिए वह अशुद्ध है।
[15] यदि तुम्हारा भाई तुम्हारे खाने मूर्ति के सामने चढाया हुआ से दुखित होता है, तो तुम प्रेम का जीवन नहीं जी रहे हो। अपने भोजन के कारण उस व्यक्ति को नाश मत करो, जिसके लिए मसीह मरे थे।
[16] तुम्हारी भलाई को बुराई समझ कर निन्दा न की जाए।
[17] इसलिए कि परमेश्वर पिता का राज्य खाना-पीना नहीं, किन्तु परमेश्वर की निगाह में धर्मी ठहराया जाना, शान्ति और खुशी है, जो पवित्र आत्मा में होता है।
[18] जो इन बातों में मसीह की सेवा करता है, उसे परमेश्वर स्वीकार करते हैं और उसे मनुष्यों के द्वारा सही ठहराया जाता है।
[19] इसलिए उन बातों को चाहो, जिनसे भाईचारा पैदा हो और जिनसे हम एक दूसरे को मज़बूत बना सकें।
[20] भोजन से परमेश्वर के काम को बर्बाद न करें। सब प्रकार की खाने की वस्तुएँ बिल्कुल शुद्ध हैं, किन्तु जो किसी को दुखित करके खाता है, उसके लिए वे बुरी हैं।
[21] अच्छा यह है, कि न मांस खाया जाए और न शराब पी जाए या ऐसी और कोई वस्तु जिसके सेवन से तुम्हारे भाई-बहन को ठोकर लगे, वह नाराज़ हो जाए या कमज़ोर बने।
[22] तुम्हारा जो विश्वास है उसे अपने परमेश्वर के सामने बनाए रखो। आशीषित (धन्य) वह व्यक्ति है, जो अपने आपको उस बात में दोषी नहीं ठहराता जिसे वह ठीक समझता है।
[23] जो व्यक्ति शक करते हुए खाता है वह दोषी ठहर चुका है, क्योंकि उसका बर्ताव विश्वास पर नहीं टिका हुआ है। जो व्यवहार विश्वास से नहीं है, वह अपराध है।