[1] पौलुस की तरफ़ से जो यीशु मसीह की सेवा करने वाला प्रेरित है, परमेश्वर की उस खुशी की खबर (सुसमाचार) के लिए अलग किया गया है,
[2] जिसका वायदा परमेश्वर ने पवित्र बाइबल में भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा पहले ही से किया था।
[3] यह वायदा परमेश्वर के बेटे हमारे प्रभु यीशु मसीह के विषय में किया गया था। शारीरिक रूप से देखा जाए तो यीशु दाऊद राजा के वंश में से थे।
[4] जहाँ तक यीशु के मरे हुओं में से जी उठने की बात है, पवित्र आत्मा की शक्ति के अनुसार यीशु मसीह के परमेश्वर के बेटे होने का ऐलान किया गया।
[5] उनके द्वारा हम ने बड़ी कृपा (अनुग्रह) और प्रेरिताई हासिल की है, ताकि सारी दुनिया के लोग यीशु के नाम के कारण, विश्वास के आज्ञापालन के द्वारा उसके शिष्य बनें।
[6] तुम भी उन्हीं में से हो, जो यीशु मसीह के हो जाने के लिए बुलाए भी गये हो।
[7] रोम में रहने वाले उन सभी को जिनसे परमेश्वर प्यार करते हैं और जो पवित्र होने के लिए बुलाए गए हैं, हमारे पिता परमेश्वर और स्वामी यीशु मसीह की तरफ़ से लगातार कृपा और शान्ति मिलती रहे।
[8] सारी दुनिया में तुम्हारे विश्वास की चर्चा हो रही है। इसलिए सब से पहले मैं तुम सभी के लिए यीशु मसीह के द्वारा अपने परमेश्वर को धन्यवाद देता हूँ।
[9] परमेश्वर, जिनकी सेवा मैं अपनी आत्मा से उनके बेटे यीशु के आनन्द के समाचार के विषय करता हूँ, इस बात के गवाह हैं, कि अपनी प्रार्थनाओं में तुम्हें याद करता रहता हूँ।
[10] यह भी बिनती करता हूँ कि मुझे परमेश्वर की इच्छा से तुम्हारे पास आने कामयाबी मिल सके।
[11] मैं इस बात की चाह रखता हूँ कि वहाँ आकर तुम्हें कुछ आत्मिक वरदान दे सकूँ ताकि तुम आत्मा में मज़बूत हो सको,
[12] वह यह कि हम आपसी विश्वास से शान्ति पा सकें।
[13] मैं यह नहीं चाहता कि तुम इस सच्चाई से अनजान रहो, कि मैंने अक्सर तुम्हारे यहाँ आना चाहा था, लेकिन अब तक रूकावट आती रही। मेरे आने की वजह यह थी कि जिस तरह से मुझे गैर यहूदियों में मेरी सेवकाई का फल मिल रहा है, उसी तरह तुम्हारे बीच भी कुछ मिले।
[14] मैं यूनानी और अन्यभाषियों, ज्ञानियों और अज्ञानियों का कर्ज़दार हूँ।
[15] तुम जो रोम में हो, मैं तुम्हें आनन्द के समाचार को देने के लिए बेसब्री से इन्तज़ार कर रहा हूँ।
[16] क्योंकि मैं मसीह के सुसंदेश से शर्माता नहीं हूँ, इसलिए कि आनन्द का समाचार हर एक की मुक्ति के लिए जो विश्वास करता है, परमेश्वर की ताकत है, चाहे वह यहूदी हो या गैरयहूदी।
[17] क्योंकि इस में परमेश्वर की धार्मिकता (खराई) विश्वास से विश्वास तक प्रगट होती है। जैसा कि लिखा है, "मुक्त हुआ (धर्मी) इन्सान विश्वास से जीवित रहेगा।"
[18] स्वर्ग से परमेश्वर का दण्ड उन लोगों की सारी दुष्टता और अन्याय पर प्रगट होता है, जो अपने अन्याय और दुष्टता से सच्चाई को दबा देते हैं।
[19] परमेश्वर के बारे में जो कुछ जाना जा सकता है वह उन के बीच में साफ़-साफ़ दिखता है, क्योंकि परमेश्वर ने उन्हें यह बातें दिखायी हैं।
[20] क्योंकि इस सृष्टि की शुरूआत से उनके अनदेखे गुण साफ़-साफ़ दिखते हैं: उनकी सदा काल की शक्ति और उनका परमेश्वरीय स्वभाव प्रकृति में देखा जा सकता है। इसलिए लोग किसी तरह का बहाना बना नहीं सकते।
[21] क्योंकि पिता परमेश्वर को जानने के बावजूद, उन्हों ने सर्वश्रेष्ठ परमेश्वर जानकर उनको आदर-सम्मान या धन्यवाद नहीं दिया। इसके विपरीत वे बेकार की बातें सोचने लगे और उनका मूर्खतापूर्ण मन अन्धेरे से भर गया।
[22] हालाँकि उन्हों ने बुद्धिमान होने का दावा तो किया, किन्तु वे बेवकूफ़ बन गए।
[23] उन्हों ने परमेश्वर को नाशमान मनुष्य, चिड़ियों, चौपायों और रेंगने वाले पशुओं की समानता में बदल दिया।
[24] इसलिए परमेश्वर ने उनको मन की अभिलाषाओं के कारण होने वाली अशुद्धता के सुपुर्द कर दिया, ताकि वे आपस में एक दूसरे की देह का अपमान करें।
[25] उन्हों ने परमेश्वर की सच्चाई के स्थान पर झूठ को चुना और परमेश्वर को जो सदा सम्मानीय हैं छोड़कर, सृष्टि की उपासना की।
[26] इसलिए परमेश्वर ने उन्हें शर्मनाक इच्छाओं के हवाले कर दिया, क्योंकि स्त्रियाँ पुरुषों के साथ शारीरिक सम्बंध को छोड़कर स्त्रियों के साथ शारीरिक सम्बंध रखने लगीं।
[27] इसी प्रकार से पुरुषों ने स्त्रियों के साथ स्वभाविक व्यवहार को छोड़कर पुरुषों के साथ यौन सम्बन्ध की कामना की। पुरुषों ने पुरुषों के साथ अभद्र व्यवहार किया और उस दण्ड से दुःख पाया जो उन्हें मिलना चाहिए था।
[28] क्योंकि जब उन्हों ने अपने जीवन में परमेश्वर को स्थान न देना चाहा, परमेश्वर ने भी उन्हें अनुचित काम करने के लिए, उनके गन्दे मन के हवाले कर दिया।
[29] वे सब प्रकार की दुष्टता, लालच और कड़वाहट से भरपूर हो गए। वे ईर्ष्या, हत्या, झगड़े, धोखे और दुश्मनी से भी भर गए।
[30] वे बुरा कहने वाले, चुगलखोर, परमेश्वर से नफ़रत करने वाले, घमण्डी, डींगमार, बुरी-बुरी बातों को बनाने वाले और माता-पिता की आज्ञा न मानने वाले हैं।
[31] बिना समझ के, शपथ तोड़ने वाले, स्वाभाविक प्रेम रहित, क्षमा रहित और निर्दयी भी हैं।
[32] यह जानने के बावजूद कि परमेश्वर न्यायी हैं और ऐसे काम करने वाले मौत के दण्ड के लायक हैं, वे न ही ये सब करते हैं, लेकिन ऐसा करने वालों से खुश भी होते हैं।