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[1] अय्यूब ने जवाब दे कर कहा,

[2] “मैं ख़ूब जानता हूँ कि तेरी बात दुरुस्त है। लेकिन अल्लाह के हुज़ूर इन्सान किस तरह रास्तबाज़ ठहर सकता है?

[3] अगर वह अदालत में अल्लाह के साथ लड़ना चाहे तो उस के हज़ार सवालात पर एक का भी जवाब नहीं दे सकेगा।

[4] अल्लाह का दिल दानिशमन्द और उस की क़ुदरत अज़ीम है। कौन कभी उस से बह्स-मुबाहसा करके कामयाब रहा है?

[5] अल्लाह पहाड़ों को खिसका देता है, और उन्हें पता ही नहीं चलता। वह ग़ुस्से में आ कर उन्हें उलटा देता है।

[6] वह ज़मीन को हिला देता है तो वह लरज़ कर अपनी जगह से हट जाती है, उस के बुन्यादी सतून काँप उठते हैं।

[7] वह सूरज को हुक्म देता है तो तुलू नहीं होता, सितारों पर मुहर लगाता है तो उन की चमक-दमक बन्द हो जाती है।

[8] अल्लाह ही आसमान को ख़ैमे की तरह तान देता, वही समुन्दरी अज़दहे की पीठ को पाँओ तले कुचल देता है।

[9] वही दुब्ब-ए-अक्बर, जौज़े, ख़ोशा-ए-पर्वीन और जुनूबी सितारों के झुर्मटों का ख़ालिक़ है।

[10] वह इतने अज़ीम काम करता है कि कोई उन की तह तक नहीं पहुँच सकता, इतने मोजिज़े करता है कि कोई उन्हें गिन नहीं सकता।

[11] जब वह मेरे सामने से गुज़रे तो मैं उसे नहीं देखता, जब वह मेरे क़रीब से फिरे तो मुझे मालूम नहीं होता।

[12] अगर वह कुछ छीन ले तो कौन उसे रोकेगा? कौन उस से कहेगा, ‘तू क्या कर रहा है?’

[13] अल्लाह तो अपना ग़ज़ब नाज़िल करने से बाज़ नहीं आता। उस के रोब तले रहब अज़दहे के मददगार भी दबक गए।

[14] तो फिर मैं किस तरह उसे जवाब दूँ, किस तरह उस से बात करने के मुनासिब अल्फ़ाज़ चुन लूँ?

[15] अगर मैं हक़ पर होता भी तो अपना दिफ़ा न कर सकता। इस मुख़ालिफ़ से मैं इल्तिजा करने के इलावा और कुछ नहीं कर सकता।

[16] अगर वह मेरी चीख़ों का जवाब देता भी तो मुझे यक़ीन न आता कि वह मेरी बात पर ध्यान देगा।

[17] थोड़ी सी ग़लती के जवाब में वह मुझे पाश पाश करता, बिलावजह मुझे बार बार ज़ख़्मी करता है।

[18] वह मुझे साँस भी नहीं लेने देता बल्कि कड़वे ज़हर से सेर कर देता है।

[19] जहाँ ताक़त की बात है तो वही क़वी है, जहाँ इन्साफ़ की बात है तो कौन उसे पेशी के लिए बुला सकता है?

[20] गो मैं बेगुनाह हूँ तो भी मेरा अपना मुँह मुझे क़ुसूरवार ठहराएगा, गो बेइल्ज़ाम हूँ तो भी वह मुझे मुजरिम क़रार देगा।

[21] जो कुछ भी हो, मैं बेइल्ज़ाम हूँ! मैं अपनी जान की परवा ही नहीं करता, अपनी ज़िन्दगी हक़ीर जानता हूँ।

[22] ख़ैर, एक ही बात है, इस लिए मैं कहता हूँ, ‘अल्लाह बेइल्ज़ाम और बेदीन दोनों को ही हलाक कर देता है।’

[23] जब कभी अचानक कोई आफ़त इन्सान को मौत के घाट उतारे तो अल्लाह बेगुनाह की परेशानी पर हँसता है।

[24] अगर कोई मुल्क बेदीन के हवाले किया जाए तो अल्लाह उस के क़ाज़ियों की आँखें बन्द कर देता है। अगर यह उस की तरफ़ से नहीं तो फिर किस की तरफ़ से है?

[25] मेरे दिन दौड़ने वाले आदमी से कहीं ज़्यादा तेज़ी से बीत गए, ख़ुशी देखे बग़ैर भाग निकले हैं।

[26] वह सरकंडे के बहरी जहाज़ों की तरह गुज़र गए हैं, उस उक़ाब की तरह जो अपने शिकार पर झपट्टा मारता है।

[27] अगर मैं कहूँ, ‘आओ मैं अपनी आहें भूल जाऊँ, अपने चेहरे की उदासी दूर करके ख़ुशी का इज़हार करूँ’

[28] तो फिर भी मैं उन तमाम तकालीफ़ से डरता हूँ जो मुझे बर्दाश्त करनी हैं। क्यूँकि मैं जानता हूँ कि तू मुझे बेगुनाह नहीं ठहराता।

[29] जो कुछ भी हो मुझे क़ुसूरवार ही क़रार दिया गया है, चुनाँचे इस का क्या फ़ाइदा कि मैं बेमानी तग-ओ-दौ में मसरूफ़ रहूँ?

[30] गो मैं साबुन से नहा लूँ और अपने हाथ सोडे से धो लूँ

[31] ताहम तू मुझे गढ़े की कीचड़ में यूँ धंसने देता है कि मुझे अपने कपड़ों से घिन आती है।

[32] अल्लाह तो मुझ जैसा इन्सान नहीं कि मैं जवाब में उस से कहूँ, ‘आओ हम अदालत में जा कर एक दूसरे का मुक़ाबला करें।’

[33] काश हमारे दरमियान सालिस हो जो हम दोनों पर हाथ रखे,

[34] जो मेरी पीठ पर से अल्लाह का डंडा हटाए ताकि उस का ख़ौफ़ मुझे दह्शतज़दा न करे।

[35] तब मैं अल्लाह से ख़ौफ़ खाए बग़ैर बोलता, क्यूँकि फ़ित्री तौर पर मैं ऐसा नहीं हूँ।

अय्यूब — Chapters