[1] यह सब कुछ मैं ने अपनी आँखों से देखा, अपने कानों से सुन कर समझ लिया है।
[2] इल्म के लिहाज़ से मैं तुम्हारे बराबर हूँ। इस नाते से मैं तुम से कम नहीं हूँ।
[3] लेकिन मैं क़ादिर-ए-मुतलक़ से ही बात करना चाहता हूँ, अल्लाह के साथ ही मुबाहसा करने की आर्ज़ू रखता हूँ।
[4] जहाँ तक तुम्हारा ताल्लुक़ है, तुम सब फ़रेबदिह लेप लगाने वाले और बेकार डाक्टर हो।
[5] काश तुम सरासर ख़ामोश रहते! ऐसा करने से तुम्हारी हिक्मत कहीं ज़्यादा ज़ाहिर होती।
[6] मुबाहसे में ज़रा मेरा मौक़िफ़ सुनो, अदालत में मेरे बयानात पर ग़ौर करो!
[7] क्या तुम अल्लाह की ख़ातिर कजरौ बातें पेश करते हो, क्या उसी की ख़ातिर झूट बोलते हो?
[8] क्या तुम उस की जानिबदारी करना चाहते हो, अल्लाह के हक़ में लड़ना चाहते हो?
[9] सोच लो, अगर वह तुम्हारी जाँच करे तो क्या तुम्हारी बात बनेगी? क्या तुम उसे यूँ धोका दे सकते हो जिस तरह इन्सान को धोका दिया जाता है?
[10] अगर तुम ख़ुफ़िया तौर पर भी जानिबदारी दिखाओ तो वह तुम्हें ज़रूर सख़्त सज़ा देगा।
[11] क्या उस का रोब तुम्हें ख़ौफ़ज़दा नहीं करेगा? क्या तुम उस से सख़्त दह्शत नहीं खाओगे?
[12] फिर जिन कहावतों की याद तुम दिलाते रहते हो वह राख की अम्साल साबित होंगी, पता चलेगा कि तुम्हारी बातें मिट्टी के अल्फ़ाज़ हैं।
[13] ख़ामोश हो कर मुझ से बाज़ आओ! जो कुछ भी मेरे साथ हो जाए, मैं बात करना चाहता हूँ।
[14] मैं अपने आप को ख़तरे में डालने के लिए तय्यार हूँ, मैं अपनी जान पर खेलूँगा।
[15] शायद वह मुझे मार डाले। कोई बात नहीं, क्यूँकि मेरी उम्मीद जाती रही है। जो कुछ भी हो में उसी के सामने अपनी राहों का दिफ़ा करूँगा।
[16] और इस में मैं पनाह लेता हूँ कि बेदीन उस के हुज़ूर आने की जुरअत नहीं करता।
[17] ध्यान से मेरे अल्फ़ाज़ सुनो, अपने कान मेरे बयानात पर धरो।
[18] तुम्हें पता चलेगा कि मैं ने एहतियात और तरतीब से अपना मुआमला तय्यार किया है। मुझे साफ़ मालूम है कि मैं हक़ पर हूँ!
[19] अगर कोई मुझे मुजरिम साबित कर सके तो मैं चुप हो जाऊँगा, दम छोड़ने तक ख़ामोश रहूँगा।
[20] ऐ अल्लाह, मेरी सिर्फ़ दो दरख़्वास्तें मन्ज़ूर कर ताकि मुझे तुझ से छुप जाने की ज़रूरत न हो।
[21] पहले, अपना हाथ मुझ से दूर कर ताकि तेरा ख़ौफ़ मुझे दह्शतज़दा न करे।
[22] दूसरे, इस के बाद मुझे बुला ताकि मैं जवाब दूँ, या मुझे पहले बोलने दे और तू ही इस का जवाब दे।
[23] मुझ से कितने गुनाह और ग़लतियाँ हुई हैं? मुझ पर मेरा जुर्म और मेरा गुनाह ज़ाहिर कर!
[24] तू अपना चेहरा मुझ से छुपाए क्यूँ रखता है? तू मुझे क्यूँ अपना दुश्मन समझता है?
[25] क्या तू हवा के झोंकों के उड़ाए हुए पत्ते को दह्शत खिलाना चाहता, ख़ुश्क भूसे का ताक़्क़ुब करना चाहता है?
[26] यह तेरा ही फ़ैसला है कि मैं तल्ख़ तजरिबों से गुज़रूँ, तेरी ही मर्ज़ी है कि मैं अपनी जवानी के गुनाहों की सज़ा पाऊँ।
[27] तू मेरे पाँओ को काठ में ठोंक कर मेरी तमाम राहों की पहरादारी करता है। तू मेरे हर एक नक़्श-ए-क़दम पर ध्यान देता है,
[28] गो मैं मै की घिसी फटी मश्क और कीड़ों का ख़राब किया हुआ लिबास हूँ।