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[1] ऐ अय्यूब, मेरी तक़रीर सुनें, मेरी तमाम बातों पर कान धरें!

[2] अब मैं अपना मुँह खोल देता हूँ, मेरी ज़बान बोलती है।

[3] मेरे अल्फ़ाज़ सीधी राह पर चलने वाले दिल से उभर आते हैं, मेरे होंट दियानतदारी से वह कुछ बयान करते हैं जो मैं जानता हूँ।

[4] अल्लाह के रूह ने मुझे बनाया, क़ादिर-ए-मुतलक़ के दम ने मुझे ज़िन्दगी बख़्शी।

[5] अगर आप इस क़ाबिल हों तो मुझे जवाब दें और अपनी बातें तरतीब से पेश करके मेरा मुक़ाबला करें।

[6] अल्लाह की नज़र में मैं तो आप के बराबर हूँ, मुझे भी मिट्टी से ले कर तश्कील दिया गया है।

[7] चुनाँचे मुझे आप के लिए दह्शत का बाइस नहीं होना चाहिए, मेरी तरफ़ से आप पर भारी बोझ नहीं आएगा।

[8] आप ने मेरे सुनते ही कहा बल्कि आप के अल्फ़ाज़ अभी तक मेरे कानों में गूँज रहे हैं,

[9] ‘मैं पाक हूँ, मुझ से जुर्म सरज़द नहीं हुआ, मैं बेगुनाह हूँ, मेरा कोई क़ुसूर नहीं।

[10] तो भी अल्लाह मुझ से झगड़ने के मवाक़े ढूँडता और मुझे अपना दुश्मन समझता है।

[11] वह मेरे पाँओ को काठ में डाल कर मेरी तमाम राहों की पहरादारी करता है।’

[12] लेकिन आप की यह बात दुरुस्त नहीं, क्यूँकि अल्लाह इन्सान से आला है।

[13] आप उस से झगड़ कर क्यूँ कहते हैं, ‘वह मेरी किसी भी बात का जवाब नहीं देता’?

[14] शायद इन्सान को अल्लाह नज़र न आए, लेकिन वह ज़रूर कभी इस तरीक़े, कभी उस तरीक़े से उस से हमकलाम होता है।

[15] कभी वह ख़्वाब या रात की रोया में उस से बात करता है। जब लोग बिस्तर पर लेट कर गहरी नींद सो जाते हैं

[16] तो अल्लाह उन के कान खोल कर अपनी नसीहतों से उन्हें दह्शतज़दा कर देता है।

[17] यूँ वह इन्सान को ग़लत काम करने और मग़रूर होने से बाज़ रख कर

[18] उस की जान गढ़े में उतरने और दरया-ए-मौत को उबूर करने से रोक देता है।

[19] कभी अल्लाह इन्सान की बिस्तर पर दर्द के ज़रीए तर्बियत करता है। तब उस की हड्डियों में लगातार जंग होती है।

[20] उस की जान को ख़ुराक से घिन आती बल्कि उसे लज़ीज़तरीन खाने से भी नफ़रत होती है।

[21] उस का गोश्त-पोस्त सुकड़ कर ग़ाइब हो जाता है जबकि जो हड्डियाँ पहले छुपी हुई थीं वह नुमायाँ तौर पर नज़र आती हैं।

[22] उस की जान गढ़े के क़रीब, उस की ज़िन्दगी हलाक करने वालों के नज़्दीक पहुँचती है।

[23] लेकिन अगर कोई फ़रिश्ता, हज़ारों में से कोई सालिस उस के पास हो जो इन्सान को सीधी राह दिखाए

[24] और उस पर तरस खा कर कहे, ‘उसे गढ़े में उतरने से छुड़ा, मुझे फ़िद्या मिल गया है,

[25] अब उस का जिस्म जवानी की निस्बत ज़्यादा तर-ओ-ताज़ा हो जाए और वह दुबारा जवानी की सी ताक़त पाए’

[26] तो फिर वह शख़्स अल्लाह से इल्तिजा करेगा, और अल्लाह उस पर मेहरबान होगा। तब वह बड़ी ख़ुशी से अल्लाह का चेहरा तकता रहेगा। इसी तरह अल्लाह इन्सान की रास्तबाज़ी बहाल करता है।

[27] ऐसा शख़्स लोगों के सामने गाएगा और कहेगा, ‘मैं ने गुनाह करके सीधी राह टेढ़ी-मेढ़ी कर दी, और मुझे कोई फ़ाइदा न हुआ।

[28] लेकिन उस ने फ़िद्या दे कर मेरी जान को मौत के गढ़े में उतरने से छुड़ाया। अब मेरी ज़िन्दगी नूर से लुत्फ़अन्दोज़ होगी।’

[29] अल्लाह इन्सान के साथ यह सब कुछ दो चार मर्तबा करता है

[30] ताकि उस की जान गढ़े से वापस आए और वह ज़िन्दगी के नूर से रौशन हो जाए।

[31] ऐ अय्यूब, ध्यान से मेरी बात सुनें, ख़ामोश हो जाएँ ताकि मैं बात करूँ।

[32] अगर आप जवाब में कुछ बताना चाहें तो बताएँ। बोलें, क्यूँकि मैं आप को रास्तबाज़ ठहराने की आर्ज़ू रखता हूँ।

[33] लेकिन अगर आप कुछ बयान नहीं कर सकते तो मेरी सुनें, चुप रहें ताकि मैं आप को हिक्मत की तालीम दूँ।”

अय्यूब — Chapters