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[1] औरत से पैदा हुआ इन्सान चन्द एक दिन ज़िन्दा रहता है, और उस की ज़िन्दगी बेचैनी से भरी रहती है।

[2] फूल की तरह वह चन्द लम्हों के लिए फूट निकलता, फिर मुरझा जाता है। साय की तरह वह थोड़ी देर के बाद ओझल हो जाता और क़ाइम नहीं रहता।

[3] क्या तू वाक़ई एक ऐसी मख़्लूक़ का इतने ग़ौर से मुआइना करना चाहता है? मैं कौन हूँ कि तू मुझे पेशी के लिए अपने हुज़ूर लाए?

[4] कौन नापाक चीज़ को पाक-साफ़ कर सकता है? कोई नहीं!

[5] इन्सान की उम्र तो मुक़र्रर हुई है, उस के महीनों की तादाद तुझे मालूम है, क्यूँकि तू ही ने उस के दिनों की वह हद बांधी है जिस से आगे वह बढ़ नहीं सकता।

[6] चुनाँचे अपनी निगाह उस से फेर ले और उसे छोड़ दे ताकि वह मज़दूर की तरह अपने थोड़े दिनों से कुछ मज़ा ले सके।

[7] अगर दरख़्त को काटा जाए तो उसे थोड़ी बहुत उम्मीद बाक़ी रहती है, क्यूँकि ऐन मुमकिन है कि मुढ से कोंपलें फूट निकलें और उस की नई शाख़ें उगती जाएँ।

[8] बेशक उस की जड़ें पुरानी हो जाएँ और उस का मुढ मिट्टी में ख़त्म होने लगे,

[9] लेकिन पानी की ख़ुश्बू सूँघते ही वह कोंपलें निकालने लगेगा, और पनीरी की सी टहनियाँ उस से फूटने लगेंगी।

[10] लेकिन इन्सान फ़र्क़ है। मरते वक़्त उस की हर तरह की ताक़त जाती रहती है, दम छोड़ते वक़्त उस का नाम-ओ-निशान तक नहीं रहता।

[11] वह उस झील की मानिन्द है जिस का पानी ओझल हो जाए, उस नदी की मानिन्द जो सुकड़ कर ख़ुश्क हो जाए।

[12] वफ़ात पाने वाले का यही हाल है। वह लेट जाता और कभी नहीं उठेगा। जब तक आसमान क़ाइम है न वह जाग उठेगा, न उसे जगाया जाएगा।

[13] काश तू मुझे पाताल में छुपा देता, मुझे वहाँ उस वक़्त तक पोशीदा रखता जब तक तेरा क़हर ठंडा न हो जाता! काश तू एक वक़्त मुक़र्रर करे जब तू मेरा दुबारा ख़याल करेगा।

[14] (क्यूँकि अगर इन्सान मर जाए तो क्या वह दुबारा ज़िन्दा हो जाएगा?) फिर मैं अपनी सख़्त ख़िदमत के तमाम दिन बर्दाश्त करता, उस वक़्त तक इन्तिज़ार करता जब तक मेरी सबुकदोशी न हो जाती।

[15] तब तू मुझे आवाज़ देता और मैं जवाब देता, तू अपने हाथों के काम का आरज़ूमन्द होता।

[16] उस वक़्त भी तू मेरे हर क़दम का शुमार करता, लेकिन न सिर्फ़ इस मक़्सद से कि मेरे गुनाहों पर ध्यान दे।

[17] तू मेरे जराइम थैले में बांध कर उस पर मुहर लगा देता, मेरी हर ग़लती को ढाँक देता।

[18] लेकिन अफ़्सोस! जिस तरह पहाड़ गिर कर चूर चूर हो जाता और चटान खिसक जाती है,

[19] जिस तरह बहता पानी पत्थर को रगड़ रगड़ कर ख़त्म करता और सैलाब मिट्टी को बहा ले जाता है उसी तरह तू इन्सान की उम्मीद ख़ाक में मिला देता है।

[20] तू मुकम्मल तौर पर उस पर ग़ालिब आ जाता तो वह कूच कर जाता है, तू उस का चेहरा बिगाड़ कर उसे फ़ारिग़ कर देता है।

[21] अगर उस के बच्चों को सरफ़राज़ किया जाए तो उसे पता नहीं चलता, अगर उन्हें पस्त किया जाए तो यह भी उस के इल्म में नहीं आता।

[22] वह सिर्फ़ अपने ही जिस्म का दर्द मह्सूस करता और अपने लिए ही मातम करता है।”

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