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[1] इन्सान दुनिया में सख़्त ख़िदमत करने पर मज्बूर होता है, जीते जी वह मज़दूर की सी ज़िन्दगी गुज़ारता है।

[2] ग़ुलाम की तरह वह शाम के साय का आरज़ूमन्द होता, मज़दूर की तरह मज़दूरी के इन्तिज़ार में रहता है।

[3] मुझे भी बेमानी महीने और मुसीबत की रातें नसीब हुई हैं।

[4] जब बिस्तर पर लेट जाता तो सोचता हूँ कि कब उठ सकता हूँ? लेकिन लगता है कि रात कभी ख़त्म नहीं होगी, और मैं फ़ज्र तक बेचैनी से करवटें बदलता रहता हूँ।

[5] मेरे जिस्म की हर जगह कीड़े और खुरंड फैल गए हैं, मेरी सुकड़ी हुई जिल्द में पीप पड़ गई है।

[6] मेरे दिन जूलाहे की नाल से कहीं ज़्यादा तेज़ी से गुज़र गए हैं। वह अपने अन्जाम तक पहुँच गए हैं, धागा ख़त्म हो गया है।

[7] ऐ अल्लाह, ख़याल रख कि मेरी ज़िन्दगी दम भर की ही है! मेरी आँखें आइन्दा कभी ख़ुशहाली नहीं देखेंगी।

[8] जो मुझे इस वक़्त देखे वह आइन्दा मुझे नहीं देखेगा। तू मेरी तरफ़ देखेगा, लेकिन मैं हूँगा नहीं।

[9] जिस तरह बादल ओझल हो कर ख़त्म हो जाता है उसी तरह पाताल में उतरने वाला वापस नहीं आता।

[10] वह दुबारा अपने घर वापस नहीं आएगा, और उस का मक़ाम उसे नहीं जानता।

[11] चुनाँचे मैं वह कुछ रोक नहीं सकता जो मेरे मुँह से निकलना चाहता है। मैं रंजीदा हालत में बात करूँगा, अपने दिल की तल्ख़ी का इज़हार करके आह-ओ-ज़ारी करूँगा।

[12] ऐ अल्लाह, क्या मैं समुन्दर या समुन्दरी अज़दहा हूँ कि तू ने मुझे नज़रबन्द कर रखा है?

[13] जब मैं कहता हूँ, ‘मेरा बिस्तर मुझे तसल्ली दे, सोने से मेरा ग़म हल्का हो जाए’

[14] तो तू मुझे हौलनाक ख़्वाबों से हिम्मत हारने देता, रोयाओं से मुझे दह्शत खिलाता है।

[15] मेरी इतनी बुरी हालत हो गई है कि सोचता हूँ, काश कोई मेरा गला घूँट कर मुझे मार डाले, काश मैं ज़िन्दा न रहूँ बल्कि दम छोड़ूँ।

[16] मैं ने ज़िन्दगी को रद्द कर दिया है, अब मैं ज़्यादा देर तक ज़िन्दा नहीं रहूँगा। मुझे छोड़, क्यूँकि मेरे दिन दम भर के ही हैं।

[17] इन्सान क्या है कि तू उस की इतनी क़दर करे, उस पर इतना ध्यान दे?

[18] वह इतना अहम तो नहीं है कि तू हर सुब्ह उस का मुआइना करे, हर लम्हा उस की जाँच-पड़ताल करे।

[19] क्या तू मुझे तकने से कभी नहीं बाज़ आएगा? क्या तू मुझे इतना सुकून भी नहीं देगा कि पल भर के लिए थूक निगलूँ?

[20] ऐ इन्सान के पहरेदार, अगर मुझ से ग़लती हुई भी तो इस से मैं ने तेरा क्या नुक़्सान किया? तू ने मुझे अपने ग़ज़ब का निशाना क्यूँ बनाया? मैं तेरे लिए बोझ क्यूँ बन गया हूँ?

[21] तू मेरा जुर्म मुआफ़ क्यूँ नहीं करता, मेरा क़ुसूर दरगुज़र क्यूँ नहीं करता? क्यूँकि जल्द ही मैं ख़ाक हो जाऊँगा। अगर तू मुझे तलाश भी करे तो नहीं मिलूँगा, क्यूँकि मैं हूँगा नहीं।”

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