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[1] इलीहू ने अपनी बात जारी रखी,

[2] “थोड़ी देर के लिए सब्र करके मुझे इस की तश्रीह करने दें, क्यूँकि मज़ीद बहुत कुछ है जो अल्लाह के हक़ में कहना है।

[3] मैं दूर दूर तक फिरूँगा ताकि वह इल्म हासिल करूँ जिस से मेरे ख़ालिक़ की रास्ती साबित हो जाए।

[4] यक़ीनन जो कुछ मैं कहूँगा वह फ़रेबदिह नहीं होगा। एक ऐसा आदमी आप के सामने खड़ा है जिस ने ख़ुलूसदिली से अपना इल्म हासिल किया है।

[5] गो अल्लाह अज़ीम क़ुदरत का मालिक है ताहम वह ख़ुलूसदिलों को रद्द नहीं करता।

[6] वह बेदीन को ज़्यादा देर तक जीने नहीं देता, लेकिन मुसीबतज़दों का इन्साफ़ करता है।

[7] वह अपनी आँखों को रास्तबाज़ों से नहीं फेरता बल्कि उन्हें बादशाहों के साथ तख़्तनशीन करके बुलन्दियों पर सरफ़राज़ करता है।

[8] फिर अगर उन्हें ज़न्जीरों में जकड़ा जाए, उन्हें मुसीबत के रस्सों में गिरिफ़्तार किया जाए

[9] तो वह उन पर ज़ाहिर करता है कि उन से क्या कुछ सरज़द हुआ है, वह उन्हें उन के जराइम पेश करके उन्हें दिखाता है कि उन का तकब्बुर का रवय्या है।

[10] वह उन के कानों को तर्बियत के लिए खोल कर उन्हें हुक्म देता है कि अपनी नाइन्साफ़ी से बाज़ आ कर वापस आओ।

[11] अगर वह मान कर उस की ख़िदमत करने लगें तो फिर वह जीते जी अपने दिन ख़ुशहाली में और अपने साल सुकून से गुज़ारेंगे।

[12] लेकिन अगर न मानें तो उन्हें दरया-ए-मौत को उबूर करना पड़ेगा, वह इल्म से महरूम रह कर मर जाएंगे।

[13] बेदीन अपनी हरकतों से अपने आप पर इलाही ग़ज़ब लाते हैं। अल्लाह उन्हें बांध भी ले, लेकिन वह मदद के लिए नहीं पुकारते।

[14] जवानी में ही उन की जान निकल जाती, उन की ज़िन्दगी मुक़द्दस फ़रिश्तों के हाथों ख़त्म हो जाती है।

[15] लेकिन अल्लाह मुसीबतज़दा को उस की मुसीबत के ज़रीए नजात देता, उस पर होने वाले ज़ुल्म की मारिफ़त उस का कान खोल देता है।

[16] वह आप को भी मुसीबत के मुँह से निकलने की तरग़ीब दिला कर एक ऐसी खुली जगह पर लाना चाहता है जहाँ रुकावट नहीं है, जहाँ आप की मेज़ उम्दा खानों से भरी रहेगी।

[17] लेकिन इस वक़्त आप अदालत का वह प्याला पी कर सेर हो गए हैं जो बेदीनों के नसीब में है, इस वक़्त अदालत और इन्साफ़ ने आप को अपनी सख़्त गिरिफ़्त में ले लिया है।

[18] ख़बरदार कि यह बात आप को कुफ़्र बकने पर न उकसाए, ऐसा न हो कि तावान की बड़ी रक़म आप को ग़लत राह पर ले जाए।

[19] क्या आप की दौलत आप का दिफ़ा करके आप को मुसीबत से बचाएगी? या क्या आप की सिरतोड़ कोशिशें यह सरअन्जाम दे सकती हैं? हरगिज़ नहीं!

[20] रात की आर्ज़ू न करें, उस वक़्त की जब क़ौमें जहाँ भी हों नेस्त-ओ-नाबूद हो जाती हैं।

[21] ख़बरदार रहें कि नाइन्साफ़ी की तरफ़ रुजू न करें, क्यूँकि आप को इसी लिए मुसीबत से आज़माया जा रहा है।

[22] अल्लाह अपनी क़ुदरत में सरफ़राज़ है। कौन उस जैसा उस्ताद है?

[23] किस ने मुक़र्रर किया कि उसे किस राह पर चलना है? कौन कह सकता है, ‘तू ने ग़लत काम किया’? कोई नहीं!

[24] उस के काम की तम्जीद करना न भूलें, उस सारे काम की जिस की लोगों ने अपने गीतों में हम्द-ओ-सना की है।

[25] हर शख़्स ने यह काम देख लिया, इन्सान ने दूर दूर से उस का मुलाहज़ा किया है।

[26] अल्लाह अज़ीम है और हम उसे नहीं जानते, उस के सालों की तादाद मालूम नहीं कर सकते।

[27] क्यूँकि वह पानी के क़तरे ऊपर खैंच कर धुन्द से बारिश निकाल लेता है,

[28] वह बारिश जो बादल ज़मीन पर बरसा देते और जिस की बौछाड़ें इन्सान पर पड़ती हैं।

[29] कौन समझ सकता है कि बादल किस तरह छा जाते, कि अल्लाह के मस्कन से बिजलियाँ किस तरह कड़कती हैं?

[30] वह अपने इर्दगिर्द रौशनी फैला कर समुन्दर की जड़ों तक सब कुछ रौशन करता है।

[31] यूँ वह बादलों से क़ौमों की परवरिश करता, उन्हें कस्रत की ख़ुराक मुहय्या करता है।

[32] वह अपनी मुट्ठियों को बादल की बिजलियों से भर कर हुक्म देता है कि क्या चीज़ अपना निशाना बनाएँ।

[33] उस के बादलों की गरजती आवाज़ उस के ग़ज़ब का एलान करती, नाइन्साफ़ी पर उस के शदीद क़हर को ज़ाहिर करती है।

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