[1] फिर इलीहू ने बात जारी रख कर कहा,
[2] “ऐ दानिशमन्दो, मेरे अल्फ़ाज़ सुनें! ऐ आलिमो, मुझ पर कान धरें!
[3] क्यूँकि कान यूँ अल्फ़ाज़ की जाँच-पड़ताल करता है जिस तरह ज़बान ख़ुराक को चख लेती है।
[4] आएँ, हम अपने लिए वह कुछ चुन लें जो दुरुस्त है, आपस में जान लें कि क्या कुछ अच्छा है।
[5] अय्यूब ने कहा है, ‘गो मैं बेगुनाह हूँ तो भी अल्लाह ने मुझे मेरे हुक़ूक़ से महरूम कर रखा है।
[6] जो फ़ैसला मेरे बारे में किया गया है उसे मैं झूट क़रार देता हूँ। गो मैं बेक़ुसूर हूँ तो भी तीर ने मुझे यूँ ज़ख़्मी कर दिया कि उस का इलाज मुमकिन ही नहीं।’
[7] अब मुझे बताएँ, क्या कोई अय्यूब जैसा बुरा है? वह तो कुफ़्र की बातें पानी की तरह पीते,
[8] बदकारों की सोह्बत में चलते और बेदीनों के साथ अपना वक़्त गुज़ारते हैं।
[9] क्यूँकि वह दावा करते हैं कि अल्लाह से लुत्फ़अन्दोज़ होना इन्सान के लिए बेफ़ाइदा है।
[10] चुनाँचे ऐ समझदार मर्दो, मेरी बात सुनें! यह कैसे हो सकता है कि अल्लाह शरीर काम करे? यह तो मुमकिन ही नहीं कि क़ादिर-ए-मुतलक़ नाइन्साफ़ी करे।
[11] यक़ीनन वह इन्सान को उस के आमाल का मुनासिब अज्र दे कर उस पर वह कुछ लाता है जिस का तक़ाज़ा उस का चाल-चलन करता है।
[12] यक़ीनन अल्लाह बेदीन हरकतें नहीं करता, क़ादिर-ए-मुतलक़ इन्साफ़ का ख़ून नहीं करता।
[13] किस ने ज़मीन को अल्लाह के हवाले किया? किस ने उसे पूरी दुनिया पर इख़तियार दिया? कोई नहीं!
[14] अगर वह कभी इरादा करे कि अपनी रूह और अपना दम इन्सान से वापस ले
[15] तो तमाम लोग दम छोड़ कर दुबारा ख़ाक हो जाएंगे।
[16] ऐ अय्यूब, अगर आप को समझ है तो सुनें, मेरी बातों पर ध्यान दें।
[17] जो इन्साफ़ से नफ़रत करे क्या वह हुकूमत कर सकता है? क्या आप उसे मुजरिम ठहराना चाहते हैं जो रास्तबाज़ और क़ादिर-ए-मुतलक़ है,
[18] जो बादशाह से कह सकता है, ‘ऐ बदमआश!’ और शुरफ़ा से, ‘ऐ बेदीनो!’?
[19] वह तो न रईसों की जानिबदारी करता, न उह्देदारों को पस्तहालों पर तर्जीह देता है, क्यूँकि सब ही को उस के हाथों ने बनाया है।
[20] वह पल भर में, आधी रात ही मर जाते हैं। शुरफ़ा को हिलाया जाता है तो वह कूच कर जाते हैं, ताक़तवरों को बग़ैर किसी तग-ओ-दौ के हटाया जाता है।
[21] क्यूँकि अल्लाह की आँखें इन्सान की राहों पर लगी रहती हैं, आदमज़ाद का हर क़दम उसे नज़र आता है।
[22] कहीं इतनी तारीकी या घना अंधेरा नहीं होता कि बदकार उस में छुप सके।
[23] और अल्लाह किसी भी इन्सान को उस वक़्त से आगाह नहीं करता जब उसे इलाही तख़्त-ए-अदालत के सामने आना है।
[24] उसे तहक़ीक़ात की ज़रूरत ही नहीं बल्कि वह ज़ोर-आवरों को पाश पाश करके दूसरों को उन की जगह खड़ा कर देता है।
[25] वह तो उन की हरकतों से वाक़िफ़ है और उन्हें रात के वक़्त यूँ तह-ओ-बाला कर सकता है कि चूर चूर हो जाएँ।
[26] उन की बेदीनी के जवाब में वह उन्हें सब की नज़रों के सामने पटख़ देता है।
[27] उस की पैरवी से हटने और उस की राहों का लिहाज़ न करने का यही नतीजा है।
[28] क्यूँकि उन की हरकतों के बाइस पस्तहालों की चीख़ें अल्लाह के सामने और मुसीबतज़दों की इल्तिजाएँ उस के कान तक पहुँचीं।
[29] लेकिन अगर वह ख़ामोश भी रहे तो कौन उसे मुजरिम क़रार दे सकता है? अगर वह अपने चेहरे को छुपाए रखे तो कौन उसे देख सकता है? वह तो क़ौम पर बल्कि हर फ़र्द पर हुकूमत करता है
[30] ताकि शरीर हुकूमत न करें और क़ौम फंस न जाए।
[31] बेहतर है कि आप अल्लाह से कहें, ‘मुझे ग़लत राह पर लाया गया है, आइन्दा मैं दुबारा बुरा काम नहीं करूँगा।
[32] जो कुछ मुझे नज़र नहीं आता वह मुझे सिखा, अगर मुझ से नाइन्साफ़ी हुई है तो आइन्दा ऐसा नहीं करूँगा।’
[33] क्या अल्लाह को आप को वह अज्र देना चाहिए जो आप की नज़र में मुनासिब है, गो आप ने उसे रद्द कर दिया है? लाज़िम है कि आप ख़ुद ही फ़ैसला करें, न कि मैं। लेकिन ज़रा वह कुछ पेश करें जो कुछ आप सहीह समझते हैं।
[34] समझदार लोग बल्कि हर दानिशमन्द जो मेरी बात सुने फ़रमाएगा,
[35] ‘अय्यूब इल्म के साथ बात नहीं कर रहा, उस के अल्फ़ाज़ फ़हम से ख़ाली हैं।
[36] काश अय्यूब की पूरी जाँच-पड़ताल की जाए, क्यूँकि वह शरीरों के से जवाब पेश करता,
[37] वह अपने गुनाह में इज़ाफ़ा करके हमारे रू-ब-रू अपने जुर्म पर शक डालता और अल्लाह पर मुतअद्दिद इल्ज़ामात लगाता है’।”